UCC पर जनजातीय समाज की मांग: सिर्फ आश्वासन नहीं, कानूनी प्रावधानों से मिले संस्कृति को सुरक्षा

छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर जनजातीय समाज के बीच आशंकाएं और विरोध जारी है, बावजूद इसके कि राज्य सरकार ने अनुसूचित जनजातियों को प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रखने का स्पष्ट आश्वासन दिया है। इस स्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकार की घोषणा के बाद भी समाज में भय का माहौल क्यों बना हुआ है।

राज्य सरकार ने UCC का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति गठित की है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जनजातीय समुदायों को UCC से अलग रखा जाएगा, क्योंकि उनका जीवन पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्थाओं पर आधारित है।
इसके बावजूद, प्रदेश के कुछ जनजातीय संगठन UCC को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं और विरोध जता रहे हैं। उनकी मुख्य मांग है कि उनकी पारंपरिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए सरकार के आश्वासन को स्पष्ट कानूनी प्रावधानों में शामिल किया जाए।
वर्तमान में, छत्तीसगढ़ में UCC लागू नहीं हुआ है। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति विभिन्न क्षेत्रों में बैठकें आयोजित कर आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों और समुदायों से सुझाव एवं आपत्तियां प्राप्त कर रही है। सुझाव और आपत्तियां प्रस्तुत करने की समय-सीमा 30 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई थी, और समिति को एक हजार से अधिक सुझाव प्राप्त हुए हैं।
समिति अब इन सुझावों और विभिन्न राज्यों में लागू कानूनों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट तैयार कर रही है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, समिति 30 नवंबर तक राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इसके बाद, दिसंबर में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में UCC से संबंधित मसौदा या विधेयक पेश किए जाने की तैयारी है।
इस बीच, जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को एक महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है। लोकतंत्र में किसी भी सरकारी नीति का विरोध करना अधिकार है, लेकिन यह भी जरूरी है कि विरोध तथ्यों पर आधारित हो। ऐसे में, जनजातीय समाज के बीच UCC को लेकर अनावश्यक भय और भ्रम फैलाने के आरोपों की निष्पक्ष समीक्षा और शिक्षित लोगों द्वारा तथ्यों पर आधारित संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
यह भी रेखांकित किया गया है कि जनजातीय समाज के सामने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक सशक्तीकरण, सड़क, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन पर भी उतनी ही गंभीरता से आवाज उठाने की आवश्यकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें समिति की रिपोर्ट और सरकार के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जिससे प्रस्तावित कानून का स्वरूप और समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए किए जाने वाले प्रावधान स्पष्ट होंगे।




