छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण: 1965 में ‘समाज’ से शुरू हुआ आंदोलन, 2000 में बना अलग राज्य

छत्तीसगढ़ आज अपना 26वां स्थापना दिवस मना रहा है। 1 नवंबर 2000 को एक अलग राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया, लेकिन इसके पीछे कई दशकों का एक लंबा और कठिन संघर्ष छिपा है। अलग राज्य के लिए लड़ने वाले आंदोलनकारियों को उस समय की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों, भाजपा और कांग्रेस के लोगों द्वारा ‘देशद्रोही’ और ‘अमेरिका का एजेंट’ तक कहा गया। इन आंदोलनकारियों को सामाजिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्हें जेल जाना पड़ा, सरकारों के सामने अपनी मांगें रखनी पड़ीं और गांवों से लेकर दिल्ली तक आंदोलन करना पड़ा।
छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के महासचिव दीनदयाल वर्मा बताते हैं कि अलग राज्य की मांग को संगठित रूप देने में छत्तीसगढ़ी समाज की अहम भूमिका रही। 16 मई 1965 को छत्तीसगढ़ी समाज की स्थापना हुई और इसी साल रायपुर के आरडी तिवारी स्कूल में पहला छत्तीसगढ़ी सम्मेलन आयोजित किया गया। यहीं से अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर आंदोलन ने एक संगठित रूप लेना शुरू किया।
दीनदयाल वर्मा के अनुसार, छत्तीसगढ़ी समाज 1965 से ही शोषण के खिलाफ संघर्ष कर रहा था। शुरुआत में यह आंदोलन सीमित स्तर पर था, लेकिन 1970 के बाद इसकी आवाज गांवों और शहरों तक पहुंचने लगी। 1979 तक इस आंदोलन ने प्रदेशव्यापी रूप ले लिया, जिसमें गांव, ब्लॉक, तहसील और जिला स्तर पर रैलियां निकाली गईं और लोगों में अलग राज्य की मांग को लेकर जागरूकता बढ़ी। उस समय आंदोलनकारियों को कई तरह के विरोध का सामना करना पड़ता था, जहां मध्यप्रदेश से अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग उठाने पर भाजपा और कांग्रेस के लोग उन्हें देशद्रोही और अमेरिका का एजेंट तक कहते थे। इसके बावजूद आंदोलनकारी अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे।
छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष (संगठन) अनिल दुबे ने बताया कि 16 मई 1965 को छत्तीसगढ़ी समाज की स्थापना के बाद, 1967 में रायपुर के ईदगाह भाटा में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। आचार्य नरेंद्र दुबे और रामानंद शुक्ला के नेतृत्व में अलग राज्य की मांग के समर्थन में 5 हजार हस्ताक्षर जुटाए गए। इस दौरान हर गांव और मुख्यालय में धरने और रैलियां लगातार होती रहीं।
अनिल दुबे ने बताया कि छत्तीसगढ़ी समाज के लोगों ने शोषण के खिलाफ संघर्ष किया और आंदोलन की प्रेरणा उन्हें अपने गुरु से मिली थी। उन्होंने छात्र जीवन से ही इस आंदोलन से जुड़ने की बात कही। आंदोलन के दौरान उन्हें रायपुर, भोपाल और दिल्ली की जेल तक जाना पड़ा। संसद और विधानसभा के सामने भी प्रदर्शन किए गए और कई आंदोलनों में उन्हें पहली पंक्ति में शामिल होने का अवसर मिला।
छत्तीसगढ़ समाज पार्टी के अध्यक्ष जीपी चंद्राकर बताते हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का आंदोलन लगातार जोर पकड़ रहा था। इसी क्रम में 23 अक्टूबर 1978 को रायपुर में अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर एक ऐतिहासिक रैली निकाली गई, जिसमें रायपुर के जयस्तंभ चौक पर 10 हजार से 15 हजार लोग शामिल हुए थे।
जीपी चंद्राकर के मुताबिक, पहले राज्य निर्माण की मांग को लेकर समाज की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा गया था, जो आगे तत्कालीन गृह मंत्री विद्या चरण शुक्ल के पास पहुंचा, लेकिन उन्होंने अलग राज्य की मांग पर ध्यान नहीं दिया। 1978 की रैली के बाद राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम फिर ज्ञापन सौंपा गया, जिसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से दिल्ली आने का बुलावा मिला। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ी समाज के अध्यक्ष और 15 प्रतिनिधि 2 दिसंबर 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से अलग राज्य के मुद्दे पर बात करने दिल्ली गए थे। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आचार्य नरेंद्र दुबे कर रहे थे, जिन्हें प्रधानमंत्री ने विशेष सम्मान दिया। आचार्य नरेंद्र दुबे स्वतंत्रता सेनानी थे और इमरजेंसी के दौरान MISA के तहत जेल में बंद रहे थे।
प्रधानमंत्री से मुलाकात के लिए सिर्फ 15 मिनट का समय दिया गया था। प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री को एक विस्तृत मास्टर प्लान दिखाया, जिसमें छत्तीसगढ़ को आत्मनिर्भर बनाने, सिंचाई क्षमता बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत करने और रोजगार पैदा करने की योजनाएं शामिल थीं। बैठक में प्रतिनिधिमंडल ने आंकड़ों के साथ बताया कि मध्यप्रदेश के राजस्व में छत्तीसगढ़ क्षेत्र का बड़ा योगदान है, लेकिन विकास के लिए यहां अनुपात के हिसाब से हिस्सा नहीं मिलता। संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद छत्तीसगढ़ लगातार पिछड़ रहा है। इन बातों का प्रधानमंत्री पर असर पड़ा। पूरी चर्चा सुनने के बाद मोरारजी देसाई ने कहा कि वे छत्तीसगढ़ राज्य की मांग के समर्थन में हैं और अगर मध्यप्रदेश सरकार अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित कर देती है, तो केंद्र सरकार इसमें देरी नहीं करेगी। आंदोलनकारियों के मुताबिक, यह पहली बार था जब किसी प्रधानमंत्री ने अलग राज्य की मांग पर सार्वजनिक रूप से सकारात्मक रुख दिखाया, जो आंदोलनकारियों के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। इससे पूरे प्रदेश में आंदोलन को नई ऊर्जा और भरोसा मिला।
जीपी चंद्राकर बताते हैं कि जब प्रतिनिधिमंडल ने इस बारे में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा को पत्र लिखा, तो उन्होंने अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनाने से मना कर दिया, जो राज्य निर्माण की राह में एक बड़ी रुकावट बन गया। चंद्राकर के मुताबिक, छत्तीसगढ़ी समाज की दलीलों से प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई इतने प्रभावित हुए थे कि वे छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने के लिए हस्ताक्षर करने को तैयार थे, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के चलते ऐसा नहीं हो सका और बाद में मोरारजी देसाई की सरकार भी गिर गई। उनका कहना है कि अगर राजनीतिक अड़चनें नहीं आतीं, तो छत्तीसगढ़ आज से 48 साल पहले ही अलग राज्य बन गया होता।
अनिल दुबे बताते हैं कि 1970 के बाद छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का आंदोलन जनक्रांति का रूप लेने लगा। हर गांव और मुख्यालय में धरने और रैलियों का सिलसिला चलता रहा। 1979 में छत्तीसगढ़ी वाहिनी का गठन किया गया। इसके बाद भोपाल विधानसभा से लेकर दिल्ली में संसद तक घेराव और विरोध प्रदर्शन किए गए। छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के नेतृत्व में 24 जुलाई 2000 को संसद का घेराव किया गया। इसमें सैकड़ों कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे और संसद भवन के सामने प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों ने राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री सचिवालय और लोकसभा सचिवालय तक ज्ञापन सौंपे। उस दिन उन्होंने 36 घंटे में छत्तीसगढ़ राज्य गठन की घोषणा करने की मांग रखी। इस आंदोलन में महिलाओं की भी बड़ी भागीदारी रही।
आंदोलनकारियों के मुताबिक, सामूहिक संघर्ष और लगातार उठाई गई मांगों के बाद आखिरकार तीन महीने बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।




