नक्सलवाद पर निर्णायक वार: छत्तीसगढ़ में 26 साल में 516 नक्सली मारे गए, विकास कार्यों को मिली गति

छत्तीसगढ़ राज्य ने 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर देश के 26वें राज्य के रूप में अपनी यात्रा शुरू की थी। राज्य गठन के समय प्रदेश के सामने कई गंभीर चुनौतियां थीं। इनमें सड़क, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी प्रमुख थी। औद्योगिक विकास सीमित था, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं थीं। दूर-दराज के गांवों और आदिवासी बहुल इलाकों तक विकास पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा के कई क्षेत्रों में नक्सलवाद के कारण विकास कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था, जिससे इन इलाकों में प्रगति बाधित हो रही थी।
अपनी स्थापना के 26 साल बाद, छत्तीसगढ़ ने इन चुनौतियों का सामना करते हुए महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं। राज्य के बजट का आकार 23 गुना से अधिक बढ़ गया है, और निवेश में 247 गुना की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है और विकास के कार्य तेजी से पहुंचे हैं। लाल आतंक को समाप्त करने की दिशा में भी राज्य को बड़ी सफलताएं मिली हैं, जो इसकी विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
राज्य के बजट के सफर की बात करें तो, यह 7, 294 करोड़ रुपए से शुरू हुआ था और अब 1.72 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। राज्य गठन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में वित्त मंत्री रामचंद्र सिंहदेव ने वर्ष 2001-02 में पहला बजट पेश किया था, जिसका आकार 7, 294 करोड़ रुपए था। इसके बाद, 2002-03 में बजट बढ़कर 8, 471 करोड़ रुपए और 2003-04 में 9, 978 करोड़ रुपए हो गया। वर्ष 2003 में सत्ता परिवर्तन के बाद, वित्त मंत्री अमर अग्रवाल के कार्यकाल में 2004-05 का बजट 10, 555 करोड़ रुपए और 2006-07 में 13, 185 करोड़ रुपए रहा।
तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इसके बाद वित्त विभाग का कार्यभार संभाला और लगातार 12 बजट पेश किए। उनके कार्यकाल के दौरान, 2007-08 में 16, 473 करोड़ रुपए का बजट 2017-18 तक बढ़कर 88, 599 करोड़ रुपए हो गया। वर्ष 2018 में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद, भूपेश बघेल ने वित्त विभाग संभाला, और उनके कार्यकाल में राज्य का बजट एक लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर गया। 2023 में भाजपा सरकार के आने के बाद भी बजट में लगातार विस्तार जारी रहा, और वर्ष 2026-27 में इसका अनुमानित आकार 1.72 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है।
छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में खनिज संसाधनों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और चूना पत्थर जैसे खनिजों पर आधारित उद्योगों ने प्रदेश को एक विशिष्ट औद्योगिक पहचान प्रदान की है। राज्य गठन के बाद से बिजली, इस्पात और सीमेंट उद्योगों का तेजी से विस्तार हुआ है। राज्य की 25 साल की विकास यात्रा के आंकड़ों के अनुसार, कुल निवेश में 247 गुना की वृद्धि का दावा किया गया है। इसके अतिरिक्त, 2026-27 के बजट में खनन क्षेत्र से 19 हजार करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होने का अनुमान लगाया गया है।
स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में भी संस्थागत सुविधाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राज्य गठन के समय प्रदेश में केवल 7 जिला अस्पताल और एक मेडिकल कॉलेज था। अब जिला अस्पतालों की संख्या बढ़कर 30 हो गई है, और मेडिकल कॉलेजों की संख्या 16 तक पहुंच गई है। साक्षरता दर में भी महत्वपूर्ण सुधार हुआ है, जो लगभग 65% से बढ़कर 79% तक पहुंच गई है।
बुनियादी ढांचे के विकास में, ग्रामीण सड़कों के निर्माण में 98 गुना की वृद्धि का दावा किया गया है, जिससे दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच बेहतर हुई है। कृषि क्षेत्र में भी राज्य ने प्रगति की है; सिंचाई का रकबा दोगुना हो गया है, खरीफ उत्पादन तीन गुना बढ़ा है, और रबी उत्पादन में छह गुना की वृद्धि दर्ज की गई है, जो किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा के लिए सकारात्मक संकेत है।
प्रदेश के विकास की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक नक्सलवाद रहा है। बस्तर के कई इलाकों में सड़क, स्कूल, अस्पताल और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना लंबे समय तक एक बड़ी चुनौती बनी रही। हालांकि, सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों, नए सुरक्षा कैंपों की स्थापना और सरकारी योजनाओं के विस्तार से इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। नक्सलवाद के खिलाफ अभियान तेज होने से प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों को गति मिली है, जिससे स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो रहा है।
लाल आतंक के खात्मे की दिशा में हुई प्रगति को राज्य की 26 साल की यात्रा का एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2024 से मार्च 2026 तक की अवधि में छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ों में 516 नक्सलियों को मार गिराया है। इसी दौरान, 2, 587 नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया है। नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के साथ-साथ पुनर्वास और विकास कार्यों का दायरा भी बढ़ाया गया है, जिससे इन क्षेत्रों में शांति और समृद्धि की नई उम्मीद जगी है।
हालांकि, 26 साल में बजट, निवेश, स्वास्थ्य संस्थानों, सड़क और कृषि उत्पादन के आंकड़ों में वृद्धि हुई है, लेकिन विकास का आकलन केवल सरकारी खर्च से नहीं किया जा सकता। ग्रामीण युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करना, किसानों की आय में स्थायी बढ़ोतरी सुनिश्चित करना, आदिवासी क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना अब भी राज्य के लिए महत्वपूर्ण कसौटियां हैं। राज्य की अगली चुनौती इन आंकड़ों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है, ताकि समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।



