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अनुदान प्राप्त महाविद्यालयों के पेंशनरों ने खोला मोर्चा, पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल रखने की मांग

शत-प्रतिशत अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त प्राध्यापकों और कर्मचारियों की पेंशन बंद किए जाने के विरोध में पेंशनरों ने मोर्चा खोल दिया है। बिलासपुर के सीएमडी और डीपी विप्र कालेज समेत रायपुर, दुर्ग, भिलाई और अंबिकापुर में सेवानिवृत्त शिक्षकों ने धरना देकर पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल रखने और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का फैसला आने तक भुगतान जारी रखने की मांग की।

पेंशनरों के अनुसार 22 जुलाई 2026 को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में उच्च शिक्षा विभाग ने सेवानिवृत्ति के समय के वेतनमान के आधार पर पेंशन और उपादान देने संबंधी प्रस्ताव रखा था। मंत्रिपरिषद ने प्रस्ताव को नियमों में प्रविधान नहीं होने और लोकहित में नहीं होने के आधार पर अमान्य कर दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में उचित कानूनी पैरवी करने की सलाह दी।

पेंशनरों का आरोप है कि विभाग ने इस निर्णय की ऐसी व्याख्या की, जिससे पहले से मिल रही पेंशन भी बंद कर दी गई। उनका कहना है कि कैबिनेट ने केवल नए या संशोधित वेतनमान के आधार पर पेंशन देने के प्रस्ताव को अमान्य किया था। पुरानी पेंशन व्यवस्था समाप्त करने का निर्णय नहीं लिया गया था।

अशासकीय अनुदान प्राप्त सेवानिवृत्त प्राध्यापक संघ के क्षेत्रीय अध्यक्ष डा. पी.एस. चौधरी और अन्य पेंशनरों ने बताया कि एक और 11 सितंबर 2026 के विभागीय आदेशों के बाद 400 से अधिक सेवानिवृत्त प्राध्यापकों और कर्मचारियों की पेंशन व उपादान प्रभावित हुए हैं। इससे पेंशनरों के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया है।

पेंशनरों के अनुसार वर्ष 1993 से अंशदायी भविष्य निधि के माध्यम से पेंशन व्यवस्था संचालित रही है। वेतन से निर्धारित अंशदान काटकर पेंशन निधि में जमा किया जाता रहा। बाद में वेतनमान के आधार पर पेंशन का भुगतान होता रहा। छठे वेतनमान के अनुसार पेंशन भुगतान का मामला हाई कोर्ट पहुंचा था। हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।

पेंशनरों की मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक पुरानी पेंशन व्यवस्था जारी रखी जाए। जून 2026 से रोकी गई पेंशन का तत्काल भुगतान हो। पेंशन बंद करने संबंधी विभागीय आदेश वापस लिए जाएं। लंबित न्यायिक मामले में अंतिम निर्णय तक पेंशनरों को आर्थिक सुरक्षा दी जाए।

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