Budget 53 crore, officers looted 67.76 crore on contractors

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गरियाबंद जिले में जल संसाधन विभाग की पैरी परियोजना में बड़ी वित्तीय अनियमितता सामने आई है। अफसरों ने 53.02 करोड़ रुपए के स्वीकृत काम के लिए ठेकेदारों को 67.76 करोड़ का भुगतान कर दिया।
मानसून सत्र के दौरान विधानसभा में ध्यानाकर्षण के तहत मामला उठने के बाद शासन स्तर पर हड़कंप मच गया है। सरकार ने इसे गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटि मानते हुए मामले की जांच के लिए 5 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन कर दिया है। कमेटी 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।
जल संसाधन विभाग की अवर सचिव विद्या भारती ने पूरे मामले को लेकर प्रमुख अभियंता को आदेश जारी किया है। इसके मुताबिक पूरा विवाद गरियाबंद जिले की पैरी दांयीं तट मुख्य नहर और फिंगेश्वर वितरक शाखा के लाइनिंग कार्य से जुड़ा है। यह कार्य पैरी दांयीं तट मुख्य नहर और फिंगेश्वर वितरक शाखा के लिए स्वीकृत था। इस काम के लिए 7 जुलाई 2008 को 53.02 करोड़ की स्वीकृति दी गई थी। विभाग ने पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति की प्रत्याशा में 67.76 करोड़ रुपए का अद्यतन भुगतान कर दिया। वित्त विभाग के निर्देशों के अनुसार प्रशासकीय स्वीकृति की राशि से अधिकतम 20% तक ही अतिरिक्त व्यय किया जा सकता है। लेकिन इस मामले में यह सीमा भी पार कर दी गई।
बिना मिलीभगत के कैसे निकल गया पैसा: पूरे घोटाले में सबसे बड़ा सवाल विभागीय एमआईएस प्रणाली पर खड़ा हो गया है। शासन के पत्र में स्पष्ट टिप्पणी की गई है कि विभागीय सहभागिता के बिना इतनी बड़ी राशि का अनियमित भुगतान संभव नहीं है। { योजना के तहत किया गया यह व्यय वित्त निर्देश 45/2010 के अनुरूप है? { किन परिस्थितियों में यह अतिरिक्त भुगतान किया गया? – विभागीय एमआईएस प्रणाली में ऐसे भुगतान का क्या प्रावधान है? इसमें प्रभारी की क्या भूमिका है? { योजना के अंतर्गत किए गए इस भुगतान के लिए कौन-कौन अधिकारी और कर्मचारी जिम्मेदार हैं? { क्या इस कार्य के अलावा विभाग के किसी अन्य प्रोजेक्ट में भी इस प्रकार की स्थिति निर्मित हुई है? – समिति के संज्ञान में आने वाली कोई अन्य आवश्यक जानकारी भी प्रतिवेदन में शामिल की जाएगी।
पैरी परियोजना छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और रायपुर जिलों की एक प्रमुख सिंचाई परियोजना है। यह महानदी की प्रमुख सहायक नदी पैरी नदी पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य नहरों के जाल (दांयी और बायीं तट नहरों तथा वितरक शाखाओं) के माध्यम से किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाना है। इस परियोजना का मूल काम दशकों पुराना है (सिकासार बांध इसी से जुड़ा है)।
इसकी नहरों के विस्तार, लाइनिंग और जीर्णोद्धार का काम कई चरणों में लंबे समय से चल रहा है। उदाहरण के लिए, जिस विवादित फिंगेश्वर वितरक शाखा और मुख्य नहर के काम की जांच हो रही है, उसे 7 जुलाई 2008 को प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी। यानी यह काम पिछले 15-16 सालों से फाइलों और जमीन पर चल रहा है। 1. संजय पाठक, बिलासपुर- अध्यक्ष 2. जयंत कुमार बिसेन, रायपुर- सदस्य 3. वसुंधरा ठाकुर, बिलासपुर- सदस्य 4. हनी जैन, दुर्ग- सदस्य 5. श्वेता खेमानी, रायपुर- सदस्य (कमेटी 15 दिन में रिपोर्ट सौंपेगी)




