Uncategorized

बस्तर एनएच निर्माण मामले में हाई कोर्ट का हस्तक्षेप, अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी के आदेश निरस्त

बस्तर में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के मामले में 16 करोड़ 30 लाख रुपये के आर्बिट्रल अवार्ड की वसूली के दौरान लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी तय करने और अवमानना कार्रवाई की चेतावनी देने वाले वाणिज्यिक कोर्ट के आदेशों में हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप किया है। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि अवार्ड विभाग के खिलाफ है, व्यक्तिगत अधिकारियों के खिलाफ नहीं। इसलिए केवल भुगतान की प्रक्रिया में जिम्मेदार होने के आधार पर अधिकारियों पर व्यक्तिगत आर्थिक दायित्व नहीं डाला जा सकता।

हालांकि हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्बिट्रल अवार्ड अंतिम हो चुका है और उसकी वसूली की कार्रवाई जारी रहेगी। वाणिज्यिक कोर्ट को मध्यस्थता अधिनियम की धारा 36 और सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 के तहत कानून में निर्धारित तरीकों से अवार्ड की रकम वसूलने का अधिकार है।

मामला केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (एमओआरटीएच) की लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म योजना के तहत बस्तर जिले में एनएच-63 के विभिन्न हिस्सों में दो लेन सड़क निर्माण से जुड़ा है। परियोजना की प्रारंभिक स्वीकृत लागत 169.23 करोड़ रुपये थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 211.53 करोड़ रुपये किया गया। परियोजना का पूरा वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया गया था और छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग कार्यान्वयन एजेंसी था।

टेंडर में सफल रही ईसीआई-कीस्टोन (जेवी) को 31 अक्टूबर 2012 को स्वीकृति पत्र और 1 दिसंबर 2012 को कार्यादेश जारी हुआ। कंपनी ने 30 जून 2019 को काम पूरा किया। इसके बाद 27 जनवरी 2020 को ठेकेदार ने 190.33 करोड़ रुपये के अतिरिक्त दावे किए, जिसे विभाग ने खारिज कर दिया।

विवाद बढ़ने पर ठेकेदार ने अनुबंध की मध्यस्थता शर्त का इस्तेमाल किया। 10 अगस्त 2020 को श्री रंगराजू को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया गया। राज्य का कहना था कि उसने केंद्र सरकार से अधिकृत प्रतिनिधि और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। एमओआरटीएच ने मार्च और जुलाई 2021 में विवाद को सुलह अथवा तीन मध्यस्थों के पैनल के जरिए हल करने की बात कही। ठेकेदार ने सुलह में शामिल होने से इनकार कर एकमात्र मध्यस्थ के समक्ष कार्यवाही जारी रखने पर जोर दिया।

राज्य ने मध्यस्थता अधिनियम की धारा 34 के तहत अवार्ड को चुनौती दी, लेकिन 1 नवंबर 2023 को याचिका समय-सीमा के आधार पर खारिज हो गई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका भी 19 जनवरी 2026 को 484 दिन की देरी के आधार पर खारिज कर दी गई। अवार्ड का भुगतान नहीं होने से ब्याज लगातार बढ़ता गया। अवार्ड धारक के अनुसार 16 जून 2026 तक कुल देय राशि 222,06,54,058 रुपये हो चुकी थी। इसी भुगतान में देरी को लेकर नवा रायपुर की जिला जज स्तर की वाणिज्यिक अदालत ने अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से बुलाना शुरू किया।

हाई कोर्ट ने इन आदेशों की समीक्षा करते हुए कहा कि मध्यस्थता अधिनियम की धारा 36 के अनुसार आर्बिट्रल अवार्ड की वसूली सिविल प्रक्रिया संहिता में डिक्री की तरह की जानी है। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी मनी डिक्री या अवार्ड की वसूली के लिए अवमानना की कार्रवाई को प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत शपथपत्र या अंडरटेकिंग लेकर अधिकारियों पर अवार्ड की रकम या उस पर बढ़ते ब्याज की व्यक्तिगत जिम्मेदारी डालने वाले निर्देशों को निरस्त कर दिया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button