21 साल बाद बजी स्कूल की घंटी:जिन स्कूलों को नक्सलियों ने बम से उड़ाया या बंद कराया, वहीं से फिर फैल रहा शिक्षा का उजियारा

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देश और दुनिया में एक ओर शिक्षा एआई के दौर तक पहुंच चुकी है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई हिस्सों में सही मायने में शिक्षा अब जाकर पहुंची है। बस्तर के जिन इलाकों में कभी नक्सलवाद के खौफ ने शिक्षा की राह रोक दी थी, वहां अब बदलाव की नई तस्वीर दिखाई देने लगी है। स्कूलों में फिर से बच्चों की आवाज गूंज रही है, शिक्षक पहुंच रहे हैं और गांवों में पढ़ाई का माहौल बन रहा है। 31 मार्च 2026 के बाद नक्सल प्रभाव खत्म होने के साथ बीजापुर और नारायणपुर के उन इलाकों में शिक्षा व्यवस्था दोबारा खड़ी की जा रही है, जहां वर्षों से स्कूल बंद थे। दोनों जिलों में कुल 52 स्कूल फिर से संचालित किए गए हैं और इनमें 1375 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें बीजापुर के 38 स्कूलों में करीब 1100 और नारायणपुर के 14 स्कूलों में 275 बच्चे अध्ययनरत हैं। नारायणपुर में चार स्कूल आजादी के बाद पहली बार खुले
नारायणपुर में भी नक्सल प्रभाव के कारण लंबे समय से बंद स्कूलों को फिर से शुरू किया गया है। जिले में कुल 14 स्कूल संचालित किए जा रहे हैं। इनमें 10 स्कूल ऐसे हैं, जो करीब 12 साल बाद फिर खुले हैं। वहीं 4 गांव ऐसे हैं, जहां आजादी के बाद पहली बार स्कूल शुरू हुआ है। इन स्कूलों में करीब 275 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। जिन गांवों में कभी स्कूल तक पहुंचना चुनौती था, वहां अब शिक्षक और बच्चे एक साथ नजर आ रहे हैं। शेष पेज 7 पर दंतेवाड़ा में पेड़ के नीचे शुरू हुई पढ़ाई
दंतेवाड़ा में भी नक्सलवाद का प्रभाव खत्म होने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव सामने आया है। जिले के लावा, बड़ेपल्ली और बैनपाल गांव में आजादी के बाद पहली बार स्कूल शुरू हो पाए हैं। इन तीनों स्कूलों में करीब 40 बच्चों का पहली बार दाखिला हुआ है। इन गांवों में अभी स्कूल भवन तैयार नहीं हुए हैं। इसके बावजूद शिक्षा शुरू करने में इंतजार नहीं किया गया। पेड़ के नीचे ही शाला प्रवेश उत्सव आयोजित कर बच्चों को स्कूल से जोड़ा गया। अब इन गांवों में स्कूल भवन निर्माण की स्वीकृति भी मिल चुकी है। यानी फिलहाल पेड़ की छांव में शुरू हुई पढ़ाई जल्द अपने भवन में पहुंचेगी। दंतेवाड़ा के मुलेर सहित कुछ अन्य गांवों में सुरक्षा कारणों से दूसरे स्थानों पर शिफ्ट किए गए स्कूलों को भी अब उनके मूल गांवों में वापस शुरू किया गया है। इससे ग्रामीणों के बच्चों को अपने गांव में ही पढ़ाई की सुविधा मिल रही है। जिन्हें बम से उड़ाया, वहां नए भवन में फिर शुरू हुई पढ़ाई
नक्सलवाद के दौर में बस्तर के चारों जिलों में स्कूल और आश्रम भी हिंसा की चपेट में आए। कई स्कूल भवनों को नक्सलियों ने बम से उड़ा दिया, तो कई जगह भवनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इसका सबसे सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा। कई इलाकों में स्कूल बंद हुए और शिक्षक व सरकारी अमला भी अंदरूनी गांवों तक नहीं पहुंच सका। अब सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद इन इलाकों में सरकारी व्यवस्थाओं की वापसी हो रही है। सुकमा के बुर्कलंका क्षेत्र का गच्छनपल्ली गांव इसके उदाहरण हैं। कभी माओवादियों की पीएलजीए बटालियन-1 का मजबूत गढ़ माने जाने वाले इस इलाके में अब नया स्कूल भवन तैयार हो चुका है। नक्सलियों द्वारा तोड़े गए पुराने स्कूल की जगह नए भवन में पढ़ाई शुरू होना गांव के लिए बदलाव की बड़ी तस्वीर है।
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