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बस्तर संभाग में इस वर्ष तेंदूपत्ता संग्रहण को लेकर ऐतिहासिक पहल की जा रही है। पहली बार नक्सल प्रभावित रहे हिड़मा के गांव पूवर्ती और पापा राव के गांव निमाईगुड़ा में तेंदूपत्ता की खरीदी शुरू होगी। नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद ऐसे 50 से अधिक गांव सामने आए हैं, जहां अब तक कभी खरीदी नहीं हुई थी, लेकिन इस साल यहां भी संग्रहण केंद्र खोले जाएंगे। अब तक इन गांवों के ग्रामीण तेंदूपत्ता तोड़ने के बावजूद उसका लाभ नहीं ले पाते थे, लेकिन अब गांवों में ही खरीदी केंद्र खुलने से उन्हें सीधा फायदा मिलेगा। प्रशासन का मानना है कि यह पहल न केवल ग्रामीणों की आय बढ़ाएगी, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाएगी। दंतेवाड़ा जिले में भी इस बार 20 से अधिक नए स्थानों पर पहली बार खरीदी शुरू करने की तैयारी है। अरनपुर, मिच्चीपारा और कोयलानपारा जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में ग्रामीणों की मांग पर खरीदी केंद्र खोले जा रहे हैं। जिले में पहले 152 फड़ों के माध्यम से खरीदी होती थी, अब 10 से अधिक नए गांव इसमें जुड़ेंगे। 18 से 20 अप्रैल के बीच खरीदी शुरू होने की संभावना जताई गई है। पिछले वर्ष जिले में लक्ष्य के मुकाबले 13,909.94 मानक बोरा संग्रहण हो सका था। पिछले वर्ष दंतेवाड़ा में 21200 पंजीकृत संग्राहकों में से 13,536 ने ही तेंदूपत्ता संग्रहण किया था। इस बार नए गांवों के जुड़ने से संग्राहकों की संख्या और उत्पादन दोनों बढ़ने की उम्मीद है। अधिकारियों के अनुसार, इस साल लक्ष्य और उपलब्धि दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। डीएफओ सुकमा अक्षय घोड़ ने कहा निर्धारित फड़ों के अलावा भी इस साल पूवर्ती और दूसरे नक्सल प्रभावित गांव में भी तेंदूपत्ता की खरीदी करेंगे। वहीं एसडीओ दंतेवाड़ा द्रोपदी ठाकुर ने कहा दंतेवाड़ा में 152 फड़ पूर्व से हैं, 11 नए और फड़ की मांग की गई है, हर गांव के लोगों को तेंदूपत्ता संग्रहण का लाभ मिले यह तैयारी की जा रही है। तेंदूपत्ता को बस्तर में हरा सोना कहा जाता है और यह लंबे समय तक नक्सलियों की आय का मुख्य स्रोत रहा है। हर गड्डी पर उनकी हिस्सेदारी तय रहती थी। लेकिन अब ठेकेदारी प्रथा खत्म होने और सरकारी खरीदी शुरू होने से यह लेवी पूरी तरह बंद हो गई है। अब भुगतान सीधे संग्राहकों के बैंक खाते में किया जाएगा, जिससे उन्हें पूरा लाभ मिलेगा और नक्सलियों की आर्थिक कमर भी टूटेगी।
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