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Home » हाईकोर्ट ने लिंगियाडीह बस्ती में तोड़फोड़ पर लगाई अंतरिम रोक:याचिकाकर्ता बोले- निगम कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए कर ही बेदखल
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हाईकोर्ट ने लिंगियाडीह बस्ती में तोड़फोड़ पर लगाई अंतरिम रोक:याचिकाकर्ता बोले- निगम कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए कर ही बेदखल

By adminApril 17, 2026No Comments5 Mins Read
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर के लिंगियाडीह बस्ती में रहने वाले 36 लोगों के घरों और कब्जों को तोड़ने की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। इन लोगों ने राजीव गांधी आश्रय योजना के तहत आवश्यक शुल्क जमा किया है। याचिकाकर्ता मोहल्लेवासियों ने अपनी याचिका में नगर निगम पर आरोप लगाया है कि रिहायशी जमीन पर कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए पीढ़ियों से वहां रह रहे लोगों को बेदखल किया जा रहा है। जस्टिस एनके चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने शुक्रवार को याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत देते हुए उनके घरों और कब्जे को तोड़ने की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। ये सभी याचिकाकर्ता वर्ष 2019–20 में हुए सर्वे के तहत राजीव गांधी आश्रय योजना के अंतर्गत पात्र पाए गए थे। इस योजना के तहत राज्य सरकार ने इन्हें कब्जे वाली जमीन पर ही पट्टा देने का निर्णय लिया था। हालांकि साल 2024 में राज्य सरकार ने अपने इस निर्णय को लागू नहीं किया। अब नगर निगम बिलासपुर ने उस स्थान पर व्यावसायिक परिसर और गार्डन विकसित करने की योजना बनाई है। सरकार और निगम से जवाब-तलब सुनवाई के दौरान जस्टिस एनके चंद्रवंशी ने यह सवाल उठाया कि राजीव गांधी आश्रय योजना के तहत आवश्यक शुल्क लेने के बावजूद अब तक पट्टा क्यों नहीं दिया गया। कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास और नगर पालिका निगम के अधिवक्ता रणवीर सिंह मरहास से इस संबंध में जवाब मांगा। जवाब में अधिवक्ताओं ने बताया कि साल 2023 में शासकीय जमीन पर पट्टा देने के नियम बदल दिए गए हैं। नए नियमों के अनुसार अब इन व्यक्तियों को उस स्थान पर पट्टा नहीं दिया जा सकता। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि प्रभावित लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत खमतराई इलाके में फ्लैट सिस्टम के रूप में एक-एक छोटा मकान देने का प्रस्ताव है। योजना रद्द होने की जानकारी राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि राजीव गांधी आश्रय योजना को अब रद्द कर दिया गया है। सरकारी वकीलों ने यह आरोप भी लगाया कि कब्जे वाली जमीन पर कब्जाधारियों और याचिकाकर्ताओं द्वारा बाजार और दुकानें लगाई जा रही हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं की दलील याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव, अनिमेष वर्मा और आशीष बैक ने न्यायालय को बताया कि साल 2023 के अधिनियम के लागू होने से पहले ही उन्हें 2019-20 की योजना के अंतर्गत पात्र घोषित किया जा चुका था। अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता साल 2022 में ही योजना के तहत प्रीमियम की राशि जमा कर चुके हैं। इस आधार पर उनका अधिकार पहले ही स्थापित हो चुका था। उन्होंने तर्क दिया कि साल 2023 में बने नए नियम या कानून में हुए किसी भी बदलाव का उनके पट्टा प्राप्त करने के अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। साथ ही यह भी कहा गया कि नया अधिनियम उनके अधिकार को समाप्त नहीं करता है। अधिवक्ता श्रीवास्तव ने बताया कि याचिकाकर्ता कई दशकों से संबंधित स्थान पर निवास कर रहे हैं, जो उनके अधिकार को और मजबूत बनाता है। उन्होंने कहा कि शासन की योजना में चयन, आवश्यक शुल्क जमा करने और स्थापित कानूनों के तहत राज्य सरकार और नगर निगम अब अपने वादे से पीछे नहीं हट सकते। हाईकोर्ट ने दी अंतरिम राहत, जून में होगी अगली सुनवाई मामले में दायर दो याचिकाओं पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने नगर निगम और राज्य सरकार को अपने-अपने जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। एक याचिका में नगर निगम का जवाब मिल चुका है, जबकि राज्य सरकार का जवाब अभी अपेक्षित है, वहीं दूसरी याचिका में सभी पक्षों के जवाब लंबित हैं। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने मामले को विस्तृत सुनवाई के योग्य मानते हुए अंतरिम राहत प्रदान की। इसके तहत आदेश दिया गया है कि अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ताओं के मकानों और कब्जे को नहीं तोड़ा जाएगा। मामले की अंतिम सुनवाई ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद जून माह में होने की संभावना है। ये है याचिकाकर्ताओं का प्रमुख आधार याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव के अनुसार राजीव गांधी आश्रय योजना के तहत कुल 503 लाभार्थियों का चयन किया गया था। इनमें से 113 लोगों को हटाकर नगर निगम वहां व्यवसायिक परिसर और गार्डन विकसित करना चाहता है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित क्षेत्र मास्टर प्लान में रिहायशी क्षेत्र के रूप में चिन्हित है, जहां व्यवसायिक निर्माण की अनुमति नहीं है। पहले किए गए वादे राजीव गांधी आश्रय योजना को निरस्त करने का कोई आधिकारिक आदेश नहीं है। पूर्व में किए गए वादों का पालन नहीं किया जा रहा है। मास्टर प्लान के विपरीत व्यवसायिक निर्माण जनहित में नहीं है। रिहायशी बस्ती को हटाना कानून और नीति दोनों के खिलाफ है। इन्हीं आधारों पर याचिकाकर्ताओं ने अपने मकानों को सुरक्षित रखने की मांग की है, जिस पर फिलहाल हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत प्रदान कर दी है।



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