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सड़क निर्माण के लिए बिना अनुमति पहाड़ की खुदाई:सुकमा में ग्रामीणों का दावा- आधा पहाड़ खत्म; खनिज विभाग ने कहा- एनओसी नहीं दी गई




सुकमा का तुमालपाड़ कभी ऐसा इलाका था, जहां कुछ साल पहले तक सुरक्षाबल भी सावधानी से आवाजाही करते थे। अब नक्सल प्रभाव कम होने के बाद यहां चार अहम सड़कों का निर्माण तेजी से हो रहा है। इन सड़कों से इलाके में विकास और लोगों की आवाजाही आसान होगी।\, लेकिन सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों से बड़े पैमाने पर पत्थर निकाले जा रहे हैं। ग्रामीणों आरोप है कि बिना वैध खनन अनुमति के लगातार ब्लास्टिंग कर पहाड़ तोड़ा जा रहा है। खनिज विभाग ने भी माना है कि संबंधित जगह के लिए अब तक खनन की एनओसी जारी नहीं की गई है। इसके बावजूद मौके पर दो क्रशर प्लांट चल रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि अब तक करीब आधा पहाड़ खत्म हो चुका है। यदि इसी तरह खनन चलता रहा तो अगले एक से डेढ़ महीने में बाकी हिस्सा भी खत्म हो सकता है। दो क्रशर प्लांट लगाकर हो रहा खनन जानकारी के अनुसार, बीआरओ के अधीन काम कर रही निजी निर्माण कंपनियों ने गिट्टी बनाने के लिए तुमालपाड़ के जंगल में दो बड़े क्रशर प्लांट लगाए हैं। कम्पार्टमेंट नंबर-475 की 0.95 हेक्टेयर शासकीय जमीन से साधारण पत्थर निकाला जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि पर्यावरण मंजूरी, राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल की अनुमति और खनिज विभाग की स्वीकृति के बिना ही ब्लास्टिंग कर पत्थर निकाले जा रहे हैं। इन्हीं पत्थरों का इस्तेमाल सड़क निर्माण में किया जा रहा है। इन चार सड़कों के लिए निकाले जा रहे पत्थर इन सड़कों के बनने से इलाके में आवागमन आसान होगा। सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ेगी और ग्रामीणों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार जैसी सुविधाओं तक पहुंचने में सुविधा मिलेगी। राजस्व और पर्यावरण दोनों पर असर नियमों के अनुसार, सड़क निर्माण एजेंसी को खनन शुरू करने से पहले जिला प्रशासन और संबंधित विभागों से अनुमति लेनी होती है। बिना अनुमति पत्थर निकालने से सरकार को रॉयल्टी का नुकसान हो सकता है। वहीं लगातार पहाड़ काटने से पर्यावरण पर भी असर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे सड़क निर्माण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर पूरे पहाड़ को खत्म करना सही नहीं है। ग्रामसभा की अनुमति जरूरी पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने कहा कि तुमालपाड़ में हो रहा खनन पेसा अधिनियम और वन अधिकार कानून की भावना के खिलाफ है। उनके अनुसार, ग्रामसभा की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि ग्रामसभा की मंजूरी के बिना वन विभाग ने अनुमति दी है तो पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। उनका आरोप है कि नक्सलवाद कमजोर होने के बाद अब इलाके की खनिज संपदा का तेजी से दोहन किया जा रहा है। विकास के साथ कानून का पालन भी जरूरी बस्तर के दूर-दराज इलाकों तक सड़क पहुंचना जरूरी है। इससे विकास, सुरक्षा और लोगों की सुविधाएं बढ़ेंगी। लेकिन सड़क निर्माण के लिए कानून और पर्यावरणीय नियमों का पालन भी उतना ही जरूरी है। यदि बिना अनुमति खनन किया जा रहा है, तो इसकी जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना ही सबसे जरूरी है।



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