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Home » शिवाजी महाराज की तलवार लौटाने किंग्स चार्ल्स को पत्र:छत्तीसगढ़ सिविल सोसाइटी ने कहा- ब्रिटेन पर करेंगे 5 ट्रिलियन डॉलर का मुकदमा
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शिवाजी महाराज की तलवार लौटाने किंग्स चार्ल्स को पत्र:छत्तीसगढ़ सिविल सोसाइटी ने कहा- ब्रिटेन पर करेंगे 5 ट्रिलियन डॉलर का मुकदमा

By adminMay 7, 2026No Comments2 Mins Read
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छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी संस्था ने ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स-III को बड़ा कानूनी अल्टीमेटम दिया है। संस्था ने मांग की है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रसिद्ध ‘जगदंबा’ तलवार और ‘वाघ नख’ समेत भारत की 211 ऐतिहासिक धरोहरों को 6 जून 2026 तक भारत लौटाया जाए। ऐसा नहीं होने पर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में 5 ट्रिलियन डॉलर का मुकदमा दायर करने की चेतावनी दी गई है। छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी (CCS) के संयोजक डॉ. कुलदीप सोलंकी ने कहा कि यह सिर्फ वस्तुओं की वापसी की मांग नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और सम्मान से जुड़ा मामला है। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक दिवस से जुड़ी डेडलाइन संस्था ने 6 जून 2026 की तारीख इसलिए तय की है, क्योंकि इसी दिन छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। CCS का कहना है कि ब्रिटेन में रखी गई भारतीय धरोहरें “लूटी गई सांस्कृतिक संपत्ति” हैं और अब उन्हें वापस लौटाने का समय आ गया है। डॉ. सोलंकी ने कहा, “भारत अब चुप रहने वाला देश नहीं है। ये सिर्फ ऐतिहासिक वस्तुएं नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक हैं।” 5 ट्रिलियन डॉलर का दावा कैसे? CCS का दावा है कि ब्रिटिश संग्रहालयों ने पिछले करीब 150 वर्षों में भारतीय धरोहरों को प्रदर्शित कर भारी कमाई की है। संस्था ने इसी कमाई, ब्याज और मुद्रास्फीति को जोड़कर 5 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा तैयार किया है। संस्था का आरोप है कि इन धरोहरों का प्रदर्शन “सांस्कृतिक शोषण” और “अवैध लाभ कमाने” जैसा है। रिक्लेमेशन लिस्ट में शामिल प्रमुख धरोहरें CCS ने अपने पत्र में कहा है कि ब्रिटेन का खुद को “विश्व इतिहास का संरक्षक” बताना सिर्फ एक बहाना है। संस्था का दावा है कि औपनिवेशिक दौर में भारत से बड़ी संख्या में ऐतिहासिक धरोहरें ले जाई गईं। पत्र में कहा गया, “अन्याय की नींव पर खड़े साम्राज्य ज्यादा समय तक टिकते नहीं। आज का आत्मनिर्भर भारत अपनी धरोहर वापस लेना जानता है।” अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़ सकता है असर अगर यह मामला ICJ तक पहुंचता है तो इसका असर सिर्फ भारत-ब्रिटेन तक सीमित नहीं रहेगा। अफ्रीका और एशिया के कई पूर्व उपनिवेश देश भी यूरोपीय देशों से अपनी सांस्कृतिक धरोहर और मुआवजे की मांग तेज कर सकते हैं।



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