![]()
छत्तीसगढ़ के गांवों में नेतृत्व की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब पंचायतों की कमान अनुभव से ज्यादा शिक्षा और सेवा भाव के साथ युवा संभाल रहे हैं। राज्य की 11,693 ग्राम पंचायतों में करीब 56% सरपंच 40 वर्ष या उससे कम उम्र के हैं। इनमें 21% ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं, जो पंचायत स्तर पर फैसलों में नई सोच ला रहे हैं। यह बदलाव नक्सल प्रभावित इलाकों-बीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर तक पहुंच चुका है, जहां युवा सरपंच विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रहे हैं। मैदानी जिलों में भी असर दिख रहा है। बालोद, धमतरी और दुर्ग जैसे जिलों में शिक्षित सरपंचों ने योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन की मिसाल पेश की है। अफसरों के मुताबिक, ग्राम सभाएं अब औपचारिकता नहीं रहीं, बल्कि गांव के फैसलों का मजबूत मंच बन चुकी हैं। ग्राम सभा बन रही ताकत: ग्राम सभाएं अब गांव के विकास का प्रभावी मंच बन रही हैं। स्वास्थ्य, पोषण और बाल कल्याण जैसे मुद्दों पर पंचायतों की सक्रिय भूमिका दिख रही है। बेहतर काम करने वाली पंचायतों को 1.50 करोड़ रुपए तक के पुरस्कार भी दिए जा रहे हैं। योग्यता जरूरी नहीं, फिर भी बढ़े शिक्षित सरपंच
पंच या सरपंच बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है। 2019 में राज्य सरकार ने पंच के लिए पांचवीं और सरपंच के लिए आठवीं तक की अनिवार्यता खत्म कर दी थी। इसके बावजूद पंचायतों में पढ़े-लिखे युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। जमीनी बदलाव की कहानियां 1. जयंती कश्यप: बस्तर के अडवाल का यह युवा चेहरा 2010 से सरपंच है। पंच पति की मौत के बाद उन्होंने सेवा का दामन थामा।सड़कों, स्कूल, आंगनबाड़ी, गार्डन, पंचायत भवन, जल मिशन के कामों से गांव की तस्वीर बदली। यही वजह है कि उनकी पहचान दिल्ली तक है। ख्यातनाम लाइवलीहुड कालेज उनके ही कार्यकाल में बना। अब यह पड़ोसी पंचायत में है। 2. नवधा लालू वर्मा : सक्ती के ग्राम पंचायत बंदोरा का यह युवा सरपंच बीएससी ग्रेजुएट है। वे पहले जनपद सदस्य थे। इनके नेतृत्व में गांवों में बुनियादी सुविधाओं, स्वास्थ्य जागरूकता और बच्चों के विकास पर बड़ा बदलाव आया है। वे अब वॉटर हार्वेस्टिंग और शिक्षा पर फोकस कर रहे हैं। आंगनबाड़ी, पंचायत भवन, गार्डन बनने से लोगों को भटकना नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ के गांवों में अब सिर्फ चुनाव नहीं, बदलाव की लड़ाई है। पढ़े-लिखे युवा सरपंच सिस्टम बदलने में जुटे हैं। यह बदलाव नक्सल प्रभावित इलाकों तक पहुंच चुका है। -दिनेश अग्रवाल, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग
<
