नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: बिलासपुर में जस्टिस रमेश सिन्हा और रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सात साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आरोपी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता की गवाही स्पष्ट, सुसंगत और भरोसेमंद है, तो उसी आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है, भले ही मेडिकल या वैज्ञानिक साक्ष्य आरोपित के पक्ष में क्यों न हों।
क्या है पूरा मामला
यह मामला बेमेतरा जिले का है। पीड़ित बच्ची अपने माता-पिता के काम पर बाहर रहने के दौरान गांव में अपने बड़े पिता के साथ रहती थी। एक दिन वह पड़ोसी के घर गई और देर तक वापस नहीं लौटी। जब उसकी बहन उसे लेने गई, तो बच्ची संदिग्ध स्थिति में मिली। घर लौटने पर उसने बताया कि पड़ोसी ने उसके साथ दुष्कर्म किया। इस घटना की शिकायत 17 मई 2022 को दर्ज कराई गई।
जांच और ट्रायल कोर्ट का फैसला
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धारा 376 और POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। जांच के दौरान मेडिकल परीक्षण में स्पष्ट सबूत नहीं मिले और डीएनए रिपोर्ट भी नकारात्मक रही।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों को विश्वसनीय मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
आरोपी की दलीलें और कोर्ट का जवाब
आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील करते हुए खुद को निर्दोष बताया। उसने कहा कि उसे झूठा फंसाया गया है और गवाहों के बयान में विरोधाभास हैं। साथ ही उसने यह भी दलील दी कि वह गूंगा-बहरा और अशिक्षित है, जिससे वह कानूनी प्रक्रिया को समझ नहीं पाया।
हाई कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि वैज्ञानिक रिपोर्ट केवल एक राय होती है और मजबूत प्रत्यक्ष गवाही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
समाज के लिए अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि समाज में महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं और ऐसे मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
अंत में अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी और सजा को यथावत रखा।
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