नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: जिले में पुलिसिंग और अपराध अन्वेषण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। पुलिस द्वारा अदालतों में पेश की जा रही कमजोर चार्जशीट, इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों में तकनीकी कमियां, स्वतंत्र गवाहों का मुकर जाना और जांच अधिकारियों की कार्यशैली अपराधियों के लिए सुरक्षा कवच साबित हो रही है। हाल ही में चार बड़े मामलों में अदालतों द्वारा आरोपितों को संदेह का लाभ देकर बरी किए जाने से पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल खुल गई है।
केस 1
थाना सरकंडा: सीलबंद नहीं हुआ हथियार, आरोपित बरी
आदेश: न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी सिद्धी व्होरा की अदालत
14 इंच का छुरा लहराकर धमकाने के आरोपित भोजराम साहू को कोर्ट ने बरी कर दिया। सरकंडा पुलिस जब्त हथियार को मालखाने में सीलबंद नहीं कर सकी। विवेचक एनए. ठाकुर खुद ही शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी बने। स्वतंत्र गवाह मुकर गए, जिसके बाद कोर्ट ने हथियार को मूल्यहीन मानते हुए नष्ट करने का आदेश दिया।
केस 2
थाना कोनी: बनावटी शिनाख्ती परेड से केस ढहा
आदेश: मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट असलम खान की अदालत
देशी मदिरा दुकान सुपरवाइजर से 1.63 लाख लूट मामले में आरोपित नीतिश और रिरखीराम बरी हुए। कोनी पुलिस की शिनाख्ती परेड में शामिल लोग पीड़ित के परिचित निकले। गवाहों ने खाली कागजों पर हस्ताक्षर कराने का आरोप लगाया। अंधेरा और मास्क के कारण पहचान न होने से अदालत ने आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
केस 3
थाना सिरगिट्टी: झूठे दहेज केस में पति-सास दोषमुक्त
आदेश: मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट असलम खान की अदालत
वर्षा चतुर्वेदी द्वारा पति पंकज और सास पद्मा पर लगाए गए दहेज प्रताड़ना व मिट्टी तेल छिड़कने के आरोप कोर्ट में साबित नहीं हुए। सिरगिट्टी पुलिस बिना वैज्ञानिक और चिकित्सकीय जांच के चालान पेश कर बैठी। पीड़िता की मां और डाक्टर की गवाही आरोपियों के पक्ष में गई, जिसके बाद अदालत ने दोनों को बरी कर दिया।
केस 4
थाना सिविल लाइन: 65बी प्रमाणपत्र नहीं, केस खारिल
आदेश: सत्र न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी की अदालत
2.58 लाख आगजनी मामले में आरोपित फिरोज खान को संदेह का लाभ मिला। सिविल लाइन पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज तो पेश किया, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी का अनिवार्य प्रमाणपत्र नहीं लगाया। मेमोरेंडम और ज़ब्ती गवाह भी मुकर गए। कोर्ट ने कहा कि मजबूत संदेह कानूनी साक्ष्य का विकल्प नहीं हो सकता।
केस 5
थाना रतनपुर: मोबाइल बना मजबूत डिजिटल साक्ष्य
आदेश: नवम् अपर सत्र न्यायाधीश अगम कुमार कश्यप की अदालत
रतनपुर पुलिस ने आरोपित गणेश मरावी के खिलाफ मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश कर एक वर्ष की सजा बरकरार रखवाई। महिला के घर में घुसकर छेड़छाड़ की कोशिश के दौरान आरोपित का मोबाइल मौके पर गिर गया था। पुलिस ने मोबाइल को डिजिटल साक्ष्य बनाकर आरोपित की नशे में घुसने वाली दलील को अदालत में गलत साबित कर दिया।
यह है पुलिस की जांच में खामियां
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पुलिस थानों में कार्यभार के दबाव में ‘शॉर्टकट’ अपना रही है। थाने में बैठकर गवाहों के बयान तैयार करना, जब्ती के दौरान स्वतंत्र गवाहों को न बुलाना और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के कानूनी नियमों (धारा 65बी) की अनदेखी करना सबसे बड़ी खामियां हैं।
आमतौर पर गवाहों के मुकरने के कारण आरोपित बरी होते हैं। इसका मुख्य कारण आरोपियों की धमकी या अन्य कारण भी हो सकते हैं। ऐसे मामलों की आईजी रेंज स्तर पर समीक्षा होती है, जिनमें विवेचकों की गलती पाए जाने पर कार्रवाई भी होती है। विवेचकों को साक्ष्य संकलन से लेकर विवेचना में सावधानियां बरतने प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
पंकज कुमार पटेल,एएसपी, शहर
एक्सपर्ट व्यू

डीएम अवस्थी,पूर्व डीजीपी छत्तीसगढ़
यदि आरोपी साक्ष्यों के अभाव में बरी हो रहे हैं, तो यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई चूक है। आर्म्स एक्ट या आगजनी जैसे मामलों में साक्ष्य न जुटा पाना अभियुक्तों को बचाने का प्रयास है। पुलिस अधीक्षकों को ऐसे विवेचकों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। अफसरों को रिफ्रेशर कोर्स के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाना अनिवार्य है, ताकि भविष्य में साक्ष्यों की कमी से अपराधी कानून की पकड़ से बाहर न निकल सकें।
गवाह बोले- थाने में खाना बनाने गए थे, पुलिस ने दस्तखत कराए, फिर आरोपित हुआ बरी
कोर्ट ने कहा- पुलिस की जांच संदेहास्पद, शराब भी पेश नहीं हुई, स्वतंत्र गवाह मुकरने से ढह गया पूरा मामला
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत ने अवैध महुआ शराब रखने के मामले में आरोपित रामचरण हरिया को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान पुलिस के स्वतंत्र जब्ती गवाह रवि यादव और विनोद यादव कोर्ट में अपने बयान से मुकर गए। दोनों ने कहा कि वे केवल थाना सीपत खाना बनाने गए थे, जहां पुलिस ने उनसे कागजों पर हस्ताक्षर करा लिए। उन्होंने किसी शराब जब्ती की कार्रवाई देखने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपित के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा और पुलिस की विवेचना गंभीर खामियों से भरी थी।
मामला थाना सीपत का है। पुलिस के अनुसार 8 मई 2020 को मुखबिर की सूचना पर ग्राम मुड़पार निवासी रामचरण हरिया के कब्जे से 4 लीटर कच्ची महुआ शराब जब्त की गई थी। आरोपित के खिलाफ आबकारी एक्ट की धारा 34(1)(क) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
अदालत ने यह भी पाया कि शराब परीक्षण के दौरान स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं थे और जब्त शराब को मालखाने में जमा करने संबंधी कोई रिकार्ड पेश नहीं किया गया। सबसे अहम बात यह रही कि कथित जब्त शराब कोर्ट में पेश ही नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि फौजदारी मामलों में संदेह का लाभ आरोपित को दिया जाता है। इसी सिद्धांत के आधार पर रामचरण हरिया को दोषमुक्त कर दिया गया।
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