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Home » बालोद के किसान नेता दाऊ नेमसिंह साहू का निधन:राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई, दिल्ली तक होती थी आंदोलनों की गूंज
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बालोद के किसान नेता दाऊ नेमसिंह साहू का निधन:राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई, दिल्ली तक होती थी आंदोलनों की गूंज

By adminMay 22, 2026No Comments2 Mins Read
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छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम कोहंगाटोला निवासी मीसाबंदी, किसान नेता दाऊ नेमसिंह साहू का गुरुवार दोपहर निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। वे किसानों, मजदूरों, शोषित वर्ग की आवाज माने जाते थे। लोकतंत्र सेनानी के रूप में भी उनकी पहचान रही। निधन की सूचना मिलते ही गांव में अंतिम दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों ने पार्थिव शरीर को नम आंखों से श्रद्धांजलि दी। अंतिम संस्कार के दौरान उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। तत्कालीन मध्यप्रदेश में किसान आंदोलनों को नई दिशा देने में दाऊ नेमसिंह साहू की अहम भूमिका रही। वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े रहे। लोकतंत्र, किसान अधिकार की लड़ाई में वे अग्रिम पंक्ति के सेनानी रहे। उनके संघर्ष की गूंज दिल्ली तक पहुंची। प्रारंभिक जीवन वरिष्ठ साहित्यकार, लेखक डॉ. अशोक आकाश के अनुसार दाऊ नेमसिंह साहू का जन्म 3 अक्टूबर 1937 को ग्राम कोहंगाटोला में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय हलधर सिंह साहू तत्कालीन मालगुजार थे। माता दुलौरिन बाई धार्मिक, संस्कारवान महिला थीं। प्रारंभिक शिक्षा रेवती नवागांव, कोहंगाटोला में हुई। माध्यमिक शिक्षा बालोद, उच्च शिक्षा दुर्ग, रायपुर में पूर्ण की। छात्र जीवन से ही वे सामाजिक मुद्दों, विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर सक्रिय रहे। किसान आंदोलन, जनसंघर्ष उन्होंने राजनीति की शुरुआत बड़े भाई इन्द्रजीत साहू के सहयोगी के रूप में की। बाद में वे किसान आंदोलनों के प्रभावशाली नेता बने। वर्ष 1971 में किसान मजदूर संघ गठन के समय उन्हें महासचिव की जिम्मेदारी मिली। संगठन के अध्यक्ष लोचन सिंह साहू थे। धान खरीदी की लेवी नीति, सिंचाई संकट, बिजली समस्या, फसल के उचित मूल्य जैसे मुद्दों को लेकर उन्होंने लगातार आंदोलन किए। बालोद के जय स्तंभ चौक में हुए आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज की घटना आज भी चर्चित है। आंदोलन के बाद शासन ने पानी छोड़ने का निर्णय लिया। आपातकाल में जेल जीवन आपातकाल के दौरान दाऊ नेमसिंह साहू 19 माह तक जेल में रहे। इस दौरान उन पर समझौते का दबाव बना, लेकिन वे डटे रहे। जेल में उन्होंने अनशन किया। गंभीर बीमारी तपेदिक से भी जूझते रहे। दो बार रायपुर के डी.के. अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इसी दौरान उनकी माता, बेटी का निधन हुआ, फिर भी वे लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई से पीछे नहीं हटे।



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