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रायगढ़ की हवाओं में पिछले 24 घंटों से सिर्फ धुआं नहीं, बल्कि अपनों को खोने की चीखें और सिसकियां घुली हुई हैं। सक्ती के वेदांता प्लांट में मंगलवार को हुए भीषण बॉयलर ब्लास्ट ने कई घरों के चिराग बुझा दिए, लेकिन इस त्रासदी का सबसे क्रूर चेहरा रायगढ़ के अस्पतालों में देखने को मिला। बदहवास परिजन एक मर्चुरी से दूसरी मर्चुरी का चक्कर काटते रहे, इस उम्मीद में कि शायद उनका अपना कहीं जीवित मिल जाए। बुधवार सुबह मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम के दौरान परिजन के करुण विलाप ने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। एक तरफ अपनों को खोने का गम था, तो दूसरी तरफ व्यवस्थाओं से उपजी बेबसी। दर्दनाक कहानियां: सूची जारी कर देते तो इतनी तकलीफ न होती डभरा निवासी विमल पटेल ने आरोप लगाया कि प्रबंधन की लापरवाही ने यह जान ली है। विमल का कहना था कि प्रशासन को घायलों और मृतकों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए थी। झारखंड के दीपक कुमार की दास्तान भी ऐसी ही है। उन्हें मंगलवार दोपहर साले पप्पू कुमार की मौत की खबर मिली। वे रात भर जिंदल, मेट्रो और मेडिकल कॉलेज के चक्कर काटते रहे। अंततः बुधवार सुबह 7:30 बजे केजीएच की मर्चुरी में उन्हें शव मिला।
सोशल मीडिया से मिली जानकारी, अब बच्चियों के सिर से उठा साया: हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बुधवार दोपहर तक 20 मौतों की पुष्टि हुई, जिनमें से 18 रायगढ़ में हुईं। बताया जा रहा है कि निजी अस्पतालों में वेंटिलेटर बेड की कमी के कारण कई मरीजों को मेडिकल कॉलेज रेफर किया, जहां इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। वर्तमान में मेडिकल कॉलेज में भर्ती झारखंड के मनीष कुमार और पश्चिम बंगाल के सुब्रोतो जाना की हालत अत्यंत नाजुक है; दोनों 90 प्रतिशत तक झुलस चुके हैं और वेंटिलेटर पर हैं। वहीं, एक अन्य घायल कैलाश महतो ने बुधवार शाम उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। साथ काम करते थे पिता-पुत्र, तबीयत खराब होने से बेटा घर रहा, पिता की मौत
पावर प्लांट में हुए भीषण हादसे के बाद दैनिक भास्कर की टीम जब रात 12 बजे प्लांट पहुंची, तो अंदर एक एंबुलेंस में दो शव रखे मिले, जिन्हें बाहर नहीं ले जाया गया था। बाहर प्रदर्शन कर रही भीड़ के उग्र होने की आशंका के चलते शवों को रोके रखा गया। हादसे में अपने पिता को खो चुके कीर्तन कुमार यादव बदहवास दिखे। उन्होंने बताया, ‘मैं और मेरे पिता उद्धव सिंह यादव प्लांट मे साथ हेल्पर के तौर पर काम करते थे। हम रोज साइकिल से साथ आते-जाते थे। मंगलवार को तबीयत खराब होने की वजह से मैं घर में रह गया। जबकि पिता काम पर गए और हादसे ने उनकी जान ले ली। आज पोस्टमार्टम करवाने के बाद मुझे स्ट्रैचर पर उन्हें घर ले जाना पड़ रहा है।’ ऐसा की दर्द जांजगीर-चांपा जिले के हरदी विशाल गांव के सनी कुमार अनंत का है। वे अपने भाई की तलाश में दर-दर भटकते रहे। उनके भाई रामेश्वर महिलांगे बॉयलर ऑपरेटर थे। सनी ने शाम 4 बजे से उन्होंने खोज शुरू की, लेकिन बुधवार तड़के के 3:30 बज गए, फिर भी कोई जानकारी नहीं मिली। वे 5-6 अस्पतालों तक पहुंचे, आईसीयू तक जाकर देखा, लेकिन कहीं भी भाई का नाम नहीं मिला।
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