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Home » गौ-तस्करी का 'ट्रायंगल कॉरिडोर'…किसान बनकर घूम रहे एजेंट:छत्तीसगढ़ में खरीदी, ओडिशा में सौदा और आंध्र में कटाई; जंगल के रास्ते कराते हैं बॉर्डर पार
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गौ-तस्करी का 'ट्रायंगल कॉरिडोर'…किसान बनकर घूम रहे एजेंट:छत्तीसगढ़ में खरीदी, ओडिशा में सौदा और आंध्र में कटाई; जंगल के रास्ते कराते हैं बॉर्डर पार

By adminMay 10, 2026No Comments7 Mins Read
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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के देवभोग से महज 8 किमी दूर ओडिशा सीमा शुरू हो जाती है। शुक्रवार की आधी रात बीजू एक्सप्रेस-वे किनारे गाय-बछड़ों के बड़े झुंड के साथ बैठे कुछ लोग मिले। पूछने पर पहले वे घबरा गए, फिर कहा कि, बेचने के लिए धरमगढ़ बाजार जा रहे हैं। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि, यह कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि हर सप्ताह चलने वाला गौ-तस्करी का संगठित नेटवर्क है। छत्तीसगढ़ से गाय-बैल रात में ओडिशा सीमा पार कराए जाते हैं। फिर कालाहांडी जिले के धरमगढ़ में लगने वाली साप्ताहिक मवेशी मंडी से इन्हें आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के कसाईघरों तक भेज दिया जाता है। देवभोग से करीब 15 किमी दूर ओडिशा के धरमगढ़ में हर शुक्रवार बड़े स्तर पर मवेशी बाजार लगता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां हर सप्ताह 5 हजार से ज्यादा गाय-बैल खरीदे और बेचे जाते हैं। इस बाजार में आने वाले करीब 90 फीसदी मवेशी आंध्रप्रदेश के कसाईघरों तक पहुंचते हैं। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ और ओडिशा सीमा पर कार्रवाई लगभग न के बराबर है। देखिए ये तस्वीरें… गांव-गांव घूमते हैं एजेंट, 1000-1500 रुपए में खरीदते हैं गाय गौ-तस्करी का नेटवर्क गांव स्तर तक फैला हुआ है। छोटे एजेंट सीमावर्ती गांवों में घूम-घूमकर बूढ़ी और कमजोर गाय-बैल 1000 से 1500 रुपए में खरीदते हैं। हर गांव से 10-20 मवेशियों को इकट्ठा कर शुक्रवार को धरमगढ़ बाजार ले जाया जाता है। बेचने वाले ग्रामीणों को पहले ही कैश रकम दे दी जाती है। एक एजेंट हर सप्ताह 50 से 100 मवेशियों का सौदा करता है। मंडी के बाहर खड़ी लग्जरी गाड़ियां बढ़ा रहीं शक धरमगढ़ मवेशी मंडी के बाहर महंगी SUVs और लग्जरी गाड़ियों की कतारें दिखीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाजार में आने वाले ज्यादातर खरीदार किसान नहीं, बल्कि बड़े एजेंट और सप्लायर होते हैं। इन एजेंटों के जरिए मवेशियों को आगे ट्रकों में भरकर आंध्रप्रदेश और तेलंगाना भेजा जाता है। पूरे नेटवर्क में दलालों, मजदूरों और स्थानीय सिस्टम की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए ओडिशा पर निर्भर सीमावर्ती इलाका गरियाबंद का सीमावर्ती इलाका पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की सुविधाओं के लिए ओडिशा पर निर्भर है। अब इसी संपर्क का इस्तेमाल गौ-तस्करी नेटवर्क भी कर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सीमा पर निगरानी और संयुक्त कार्रवाई नहीं होने से यह अवैध कारोबार लगातार बढ़ रहा है। एक मवेशी खरीदें या 100, शुल्क सिर्फ 100 रुपए धरमगढ़ के मंडी में नियमों के मुताबिक, बिकने वाले पशुओं को ले जाने के लिए 100 रुपए की रसीद कटानी पड़ती है। चाहे एक मवेशी खरीदें या 100, शुल्क के तौर पर 100 रुपए ही देना पड़ता है। दलाल गांव के लोगों से पहले ही खरीद चुके मवेशियों को बाजार में लेकर आते हैं और यहां सौदा होना बताते हैं। दलाल के दूसरे आदमी सभी मवेशियों को एक झुंड में कर उन्हें शुल्क चुकाते हुए बाजार ले जाते हैं। मंडी के कर्मचारियों को पता रहता है कि ये गाय-बैल किसान या गांव वाले नहीं, बल्कि गौ-तस्कर खरीद रहे हैं। जंगल के रास्ते 150 किमी पैदल ले जाते हैं मवेशियों को मंडी से गौ-तस्करों के लोग मवेशियों को अपने साथ पैदल आंध्रप्रदेश सीमा तक ले जाते हैं। वे धरमगढ़ से करीब 150 किमी दूर आंध्र के जयपुर, मानापुर और आमपानी घाटी तक मवेशियों को 2-3 दिन में लेकर पहुंचाते हैं। 1500 रुपए में खरीदे गए मवेशियों को पैदल ले जाने का खर्च 500 रुपए जोड़ा जाता है। वे आंध्र सीमा पर इन्हीं पशुओं को दलालों के हाथों 4000 रुपए तक में बेचते हैं। सड़क मार्ग से पकड़े जाने का डर रहता है इसलिए जंगल के रास्ते से जाते हैं। आंध्र सीमा से इन पशुओं को बीफ के लिए अन्य शहरों में भेजा जाता है। अधिकतर सप्लाई गरियाबंद से मंडी के कुछ कर्मचारियों ने बताया कि, यहां छत्तीसगढ़ के सिर्फ गरियाबंद जिले से ही मवेशी बेचने के लिए लाए जाते हैं। वहां के कुछ खरीदार भी आते हैं। उन्हें हिंदी में बात करते हुए सुनकर समझ जाते हैं कि ये छत्तीसगढ़ से हैं। मवेशियों का सौदा कर वे उन्हें इसी रास्ते से आंध्रप्रदेश ले जाते हैं। कुछ साल पहले तक महासमुंद-पिथौरा होते हुए उन्हें आगे दूसरे राज्यों में भिजवाया जाता था। अब पकड़े जाने का डर होने की वजह से ऐसा नहीं करते। 6 साल में 21 मामले, 52 गिरफ्तारियां गौ तस्करी रोकना पुलिस या किसी भी विभाग की प्राथमिकता में नहीं रहता। शायद यही वजह है कि अधिकतर वे ही मामले दर्ज होते हैं, जो संगठन या युवा पुलिस के संज्ञान में लाते हैं। गौ-तस्करी का गढ़ बन चुके गरियाबंद जिले में 2020 से अप्रैल 2026 तक यानी 6 साल से भी अधिक समय में मवेशी तस्करी के महज 21 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 52 लोगों की गिरफ्तारी हुई। सर्वाधिक 8 मामले और 20 गिरफ्तारियां पिछले साल हुईं। दो दौर…और गौ-तस्करी पूरी कालाहांडी की सीमा: मवेशियों को बाजार से सीधे वाहनों में नहीं ले जाया जाता। इसके बजाय उन्हें पैदल हांकते हुए चरणबद्ध तरीके से सीमा पार कराया जाता है। इसके लिए ट्रेंड मजदूर लगाए जाते हैं। लगभग 40 से 50 मवेशियों के पीछे चार मजदूर चलते हैं। इन मजदूरों का काम मवेशियों को चराते हुए कालाहांडी सीमा तक पहुंचाना होता है। इसके एवज में प्रति मवेशी करीब 500 रुपए तक खर्च आता है। मजदूरों ने नाम नहीं बताया, लेकिन बताया कि उनकी जिम्मेदारी मवेशियों को कालाहांडी सीमा पार कराने तक ही रहती है। पहला पड़ाव कालाहांडी के आमपानी थाना क्षेत्र से होकर नवरंगपुर मार्ग की घाटियों को पार करते हुए बीरीमाल तक माना जाता है। यहां पहली टीम की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। कोरापुट तक: दूसरा चरण नवरंगपुर से शुरू होकर कोरापुट तक चलता है। पूरा नेटवर्क इस तरह तैयार किया गया है कि साप्ताहिक बाजार से निकले मवेशियों को तीन दिनों के भीतर आंध्र सीमा तक पहुंचा दिया जाए। बूढ़े और अधमरे मवेशियों को मेटाडोर जैसे हल्के वाहनों से ले जाया जाता है। पहले किसान बताया, फिर रास्ते का खर्च देने लगा मवेशियों को सीमा तक ले जा रहा एक कथित कोचिया शुरुआत में सवालों से बचता रहा। साथ चल रहे मजदूरों को किसान बताया और कहा कि उन्होंने दो-तीन जोड़ी बैल खरीदे हैं। दावा किया कि सभी लोग पास के गांव चोलपड़ा के रहने वाले हैं। मवेशियों को बेहरा बाजार ले जा रहे हैं। बाद में वह खुद ही उलझ गया। मजदूरों को किसान बताने वाला यही व्यक्ति बाद में उन्हें खर्च के लिए पैसे देता नजर आया। उसने बताया कि छत्तीसगढ़ सीमा से लगे बेहरा का मवेशी बाजार अब देवभोग क्षेत्र के बंद पड़े बाजारों का विकल्प बन चुका है। पिछले सालों में देवभोग क्षेत्र के गोहरापदर और उरमाल बाजारों में मवेशियों की खरीद-बिक्री लगभग ठप हो गई है। स्थानीय स्तर पर सक्रिय विहिप कार्यकर्ताओं ने कुछ मामलों में आंध्र तक जुड़े तस्करी नेटवर्क के लोगों को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया था। इसके बाद गतिविधियां सीमित हुईं, लेकिन अब कारोबार का केंद्र ओडिशा के बाजारों में शिफ्ट हो गया है। दलाल ने दावा किया कि इस बाजार में भी दूर-दूर से खरीदार पहुंच रहे हैं। मवेशी तस्करी की मुझे जानकारी नहीं- कलेक्टर गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने बताया कि, जिले से मवेशियों की तस्करी होने जैसी कोई जानकारी फिलहाल मुझे नहीं है। अगर ऐसा है तो इस बारे में जानकारी जुटाएंगे। आवश्यक कानूनी कार्रवाई के लिए संबंधित अफसरों को दिशा-निर्देश भी दिए जाएंगे। सरहदी इलाकों में चौकसी बढ़ाई गई- एसपी गरियाबंद एसपी नीरज चंद्राकर का कहना है कि, पुलिस मवेशियों की तस्करी पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। ओडिशा के सरहदी इलाकों में चौकसी बढ़ाई गई है। ग्रामीणों की मदद से निगरानी तंत्र को पहले से और मजबूत किया गया है। समय-समय पर कार्रवाई भी की जाती है।



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