बिलासपुर के सत्र न्यायालय ने चेक बाउंस के एक मामले में निचली अदालत का फैसला पलटते हुए आरोपी संजय जायसवाल को 6 महीने की जेल और ₹20 लाख जुर्माने की सजा …और पढ़ें

HighLights
- चेक बाउंस मामला:सत्र न्यायालय ने पलटा निचली अदालत का फैसला
- चेक बाउंस केस में सिर्फ ‘हस्ताक्षर’ होना सजा का आधार नहीं
- 6 महीने की कैद और 20 लाख के हर्जाने की सजा निरस्त
नईदुनिया प्रतिनिधि बिलासपुर: चेक बाउंस के मामलों में केवल हस्ताक्षर होना ही सजा का आधार नहीं बन सकता, जब तक परिवादी कर्ज देने की वित्तीय क्षमता प्रमाणित न कर दे। विशेष न्यायाधीश लवकेश प्रताप सिंह बघेल की अदालत ने चेक बाउंस के मामले में निचली अदालत का फैसला पलटते हुए अपीलार्थी संजय जायसवाल को दी गई।
छह महीने की कैद और 20 लाख रुपये के हर्जाने की सजा को निरस्त कर दोषमुक्त कर दिया है। यदुनंदन नगर निवासी परिवादी रामकुमार जायसवाल (साला) ने अपने बहनोई संजय जायसवाल (कोरबा) के खिलाफ शिकायत की थी कि उसने बेमेतरा में ‘जल जीवन मिशन’ के ठेकेदारी कार्य के लिए समय-समय पर नकद व आरटीजीएस से 50 लाख रुपये उधार दिए थे।
इसके एवज में दिया गया 15 लाख का चेक बाउंस हो गया था। विशेष अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के तीन प्रमुख न्यायदृष्टांतों को आधार बनाय है। वित्तीय क्षमता को चुनौती (टेढ़ी सिंह – 2022) आरोपित द्वारा सवाल उठाने पर परिवादी को कर्ज का स्रोत साबित करना होता है। साला कोर्ट में कोई भी आइटीआर या बैंक स्टेटमेंट पेश नहीं कर सका।
संभावनाओं की प्रबलता (रंगप्पा – फुल बेंच) उपधारणा का खंडन करने के लिए आरोपित को ‘अकाट्य सबूत’ की जरूरत नहीं, केवल ‘संभावनाओं की प्रबलता’ के आधार पर संदेह पैदा करना पर्याप्त है। मात्र गवाही पर्याप्त नहीं (कुमार एक्सपोर्ट्स – 2009): परिवादी ने खुद माना कि आरोपी ठेकेदार नहीं, पान दुकान चलाता है। कोर्ट ने माना कि दावे सिर्फ ‘अनुमान’ पर आधारित थे।
नोटिस में अतिरिक्त राशि जोड़ना गलत नहीं
कावेरी प्लास्टिक्स के तहत कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि नोटिस में मूल चेक राशि (15 लाख) दर्ज है, तो ब्याज या कानूनी खर्च जोड़ने से नोटिस अवैध नहीं होता। न्यायालय ने आदेश जारी करते हुए कहा कि चूंकि परिवादी विधिक रूप से प्रवर्तनीय ऋण प्रमाणित नहीं कर सका, इसलिए सत्र न्यायालय ने त्रुटिपूर्ण आदेश को रद्द कर आरोपी को ससम्मान बरी कर दिया।
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