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स्टोरीटेलर अमनदीप ख्याल शनिवार को काव्य कुंभ में परफॉर्मेंस के लिए रायपुर पहुंचे। कार्यक्रम में उन्होंने अपने लोकप्रिय लाइव स्टोरीटेलिंग शो ‘धक-धक’ की तरह ही श्रोताओं को अपनी जिंदगी के किस्सों से जोड़ लिया। प्रेम, रिश्तों, अकेलेपन और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को कहानियों में पिरोने वाले अमनदीप ने मंच से अपनी यात्रा साझा की। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि नौकरी के दौरान मुझे ऑफिस का माहौल कभी पसंद नहीं आया। फुल टाइम स्टोरीटेलिंग और नौकरी छोड़ने से पहले उन्होंने 12 महीने की सेविंग्स की। इसी भरोसे वे पूरी तरह कहानी कहने की दुनिया में उतर गए। अमनदीप ने बताया कि आज भी जब वे किसी मंच पर प्रस्तुति देने जाते हैं तो अपने दादाजी की 45 साल पुरानी घड़ी पहनकर ही स्टेज पर परफार्मेंस देते हैं। इस घड़ी की खास बात यह है कि यह चाबी देने से चलती है। उन्होंने बताया कि उनके लिए स्टेज घर की तरह सबसे सुरक्षित जगह है। पढ़िए इंटरव्यू… सवाल: आपने अपने नाम के साथ ‘ख्याल’ क्यों जोड़ा? इसके पीछे क्या कहानी है? जवाब : इसके पीछे कोई खास कहानी नहीं है। कॉलेज के दिनों से मैं फेसबुक पर अपने लिखे हुए शेर और विचार पोस्ट करता था। रैंडम थॉट्स लिखता था। लोग उन्हें कॉपी कर लेते थे, इसलिए मैंने सोचा कि कोई ऐसा उर्दू शब्द लिखूं जो अलग लगे और लोगों का ध्यान खींचे। अपने पोस्ट के ऊपर ‘ख्याल’ लिखना शुरू कर दिया। बाद में जब मैंने इसे फुल-टाइम करना शुरू किया तो लगा कि यह नाम अच्छा है। फिर हर जगह अपने नाम के साथ ‘ख्याल’ जोड़ने लगा और वही मेरी पहचान बन गई। सवाल: आपने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, नौकरी भी की। फिर कहानीकार बनने का फैसला कैसे लिया? जवाब : मैं खुद को शायर से ज्यादा कहानीकार मानता हूं। नौकरी के दौरान मुझे ऑफिस का माहौल कभी पसंद नहीं आया। मेरी आदत रही है कि अगर कोई काम दिया जाए तो मैं उसे पूरी जिम्मेदारी से करता हूं, लेकिन ऑफिस शायद पहली ऐसी जगह थी जहां न तो काम पसंद आता था और न ही उसे करने का मन करता था। उस समय मैं स्टेज से जुड़ा रहता था, इसलिए लगा कि कुछ ऐसा करना चाहिए जो मंच के आसपास हो। धीरे-धीरे कहानियां निकलती गईं, शब्द जुड़ते गए और यही सफर शुरू हो गया। सवाल: आपने नौकरी छोड़कर अपने जुनून को चुना। आपने फाइनेंशियल बैकअप को लेकर क्या तैयारी की थी? जवाब : जब मैं अपना करियर बदलने की सोच रहा था, तब मेरे एक दोस्त मुझसे पूछा था कि मैं एक महीने में कितना खर्च करता हूं। मैंने हिसाब लगाया। और मेरे दोस्त ने कहा कि कम से कम नौ महीने का खर्च बचाकर रखो। मैं थोड़ा डरा हुआ था, इसलिए मैंने पूरे बारह महीने का खर्च बचाया और अपने काम में डूब गया। आज भी 12 महीने के वह रकम मैंने संभालकर रखी है और उसकी एफडी बना रखी है। उसे आज तक नहीं छूए है वह मेरे लिए उम्मीद। मैं युवाओं से भी यही कहूंगा कि किसी नए क्षेत्र में आने से पहले कुछ आर्थिक सुरक्षा जरूर बना लें। इतना पैसा बचा लें कि आपको कुछ समय मिले और आप बिना दबाव के अपने सपनों पर काम कर सकें। सवाल: आपने हाथ में पुरानी घड़ी पहनी है इसकी क्या वजह है ? जवाब: ये घड़ी मेरे दादा जी कि है, जिसे मैं सिर्फ स्टेज परफार्मेंस के दौरान पहनता हूं। मेरे लिए स्टेज सेफ स्पेस है। वो मेरा घर और मैं वहां संपूर्ण तरीके से खुद होता हूं। ऐसी ही छोटी चीजे मुझे खुद से मिलाती है। मेरे दादा जी की घड़ी उन्हीं में से एक है। इसे पहले मेरे पापा पहनते थे फिर बाद में मैंने उनसे इसे लिया। घड़ी 45 साल पुरानी है। इसे और मैं थर्ड जनरेशन हूं, जिसे मैं अपने परफार्मेंस के दौरान पहनता हूं। ये घड़ी चाबी देने से चलती है। इससे बहुत कुछ जुड़ा है। दादा जी और पिता जी की याद जुड़ी है। सवाल: आपकी कहानियां आपकी अपनी जिंदगी से जुड़ी होती हैं या सिर्फ कल्पना होती हैं? जवाब: यह दोनों का मिश्रण होता है। कुछ बातें मैंने खुद जी होती हैं, कुछ कहीं देखी-सुनी होती हैं और कुछ पढ़ी हुई होती हैं। इन सभी अनुभवों को मिलाकर मैं एक नई कहानी गढ़ता हूं। जिंदगी के अनुभव और कल्पना, दोनों मिलकर कहानी को आकार देता हूं। सवाल: अगर आप कहानीकार नहीं होते तो क्या करते? जवाब: इतना तय है कि मैं स्टेज के आसपास ही किसी न किसी काम में होता। मैं मुंबई स्टेज मैनेजर बनने के इरादे से गया था। शायद किसी बड़े अवॉर्ड फंक्शन के बैकस्टेज में काम कर रहा होता, लेकिन मंच से जुड़ा जरूर रहता। आज भी कई दोस्तों के कार्यक्रमों में बैकस्टेज जाकर मैनेजमेंट संभालता हूं। सवाल: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में रचनात्मक लेखन को आप कैसे देखते हैं? जवाब: हर नई तकनीक बदलाव लेकर आती है। AI भी उसी बदलाव का हिस्सा है और हमें उसके साथ खुद को ढालना होगा। AI आपको अच्छी जानकारी और बेहतर संरचना दे सकता है, लेकिन उसमें भावनाओं की कमी होती है। मेरा मानना है कि AI की अच्छी बातों को अपनाना चाहिए, लेकिन अपनी संवेदनाएं, अनुभव और भावनाएं कहानी में खुद जोड़नी चाहिए। सवाल: आज युवाओं के बीच आपकी काफी लोकप्रियता है। अगर कोई युवा इस क्षेत्र में आना चाहता है तो आप उसे क्या सलाह देना चाहेंगे? जवाब: बहुत आसान है। अगर आप लिखते हैं तो लगातार लिखिए, पढ़िए और अभ्यास करते रहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि जो आपने लिखा है उसे अपने तक सीमित मत रखिए। अपने आसपास होने वाले ओपन माइक में हिस्सा लीजिए। अगर आपके शहर में ओपन माइक नहीं होता है तो चार-पांच ऐसे दोस्तों को जोड़िए जिन्हें कविता, कहानी या साहित्य में रुचि हो और अपना छोटा सा मंच तैयार कर लीजिए। नियमित रूप से लोगों के सामने प्रस्तुति दीजिए। जब आपको लगे कि आपकी प्रस्तुति बेहतर हो रही है, तो उसका एक साधारण वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कीजिए। अगर आपकी कहानी, कविता या नज़्म लोगों के दिल को छूती है तो वह निश्चित रूप से अपने आप लोगों तक पहुंच जाएगी। सवाल: आज सोशल मीडिया पर नफरत और विभाजन की बातें ज्यादा दिखाई देती हैं। इसे आप कैसे देखते हैं? जवाब: मेरे एक मित्र और लेखक हैं, उन्होंने एक बात कही है, जिसे हमने गाठ बांध लिया है। इस दुनिया में 2 लकीरें हैं, एक प्रेम और अच्छाई की, दूसरी नफरत और बुराई की। जब नफरत की रेखा बड़ी दिखे तो आपका काम उसे मिटाने में ऊर्जा खर्च करना नहीं है। आपका काम प्रेम और अच्छाई की रेखा को और बड़ा करना है। नरेश सक्सेना कहते हैं प्यार से अच्छी चीजें बनाई जाती है। नफरत से कुछ नहीं बनता है। सवाल: आपके पसंदीदा कवि और कविता कौन सी है? जवाब: किसी एक को पसंदीदा कहना मुश्किल है, क्योंकि बहुत सारे कवि और शायर हैं, जिन्हें मैं पढ़ता और पसंद करता हूं। लेकिन जावेद अख्तर साहब मुझे बहुत प्रिय हैं। दिलचस्प बात यह है कि हमारा जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है और वे मुझसे ठीक 51 साल बड़े हैं। उनका एक शेर मुझे हमेशा प्रेरित करता है- “क्यों डरे कि ज़िंदगी में क्या होगा,
क्यों डरे कि ज़िंदगी में क्या होगा,
कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा।”
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