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बस्तर के उस अबूझ इलाके में, जहां कभी परिंदा भी पर मारने से पहले नक्सलियों की इजाजत लेता था, आज वहां तिरंगे का इकबाल बुलंद हो रहा है। माड़ बचाओ अभियान के तहत नारायणपुर पुलिस, डीआरजी, एसटीएफ और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने एक संयुक्त ऑपरेशन में नक्सलियों के उस डंप को खोज निकाला है, जिसे वे अपना सेफ हाउस और वार चेस्ट (युद्ध निधि) मानते थे। इस अभियान में 1,01,64,000 नगद और एके-47 जैसे घातक हथियारों का मिलना यह साबित करता है कि फोर्स ने एक बडा अभियान सफलतापूर्वक पूरा किया है। इस सफलता की नींव हथियारों से नहीं, बल्कि भरोसे से रखी गई। पुलिस अधीक्षक रोबिनसन गुड़िया के मार्गदर्शन में सुरक्षा बलों ने माड़ बचाओ अभियान के जरिए अंदरूनी गांवों के आदिवासियों का दिल जीता। पहली
बार नक्सलियों के गढ़ से ग्रामीणों ने खुद निकलकर पुलिस को कैश डंप और हथियार भंडार की सटीक लोकेशन दी। इसके अलावा एक महिला आत्मसमर्पित नक्सली की भूमिका भी इस डंप को पकड़वाने में महत्वपूर्ण रही है। पिछले 30 दिनों से 500 से अधिक जवानों ने सुदूर पहाड़ियों और घने जंगलों में एरिया डोमिनेशन किया, जिससे नक्सलियों की मूवमेंट पूरी तरह प्रतिबंधित हो गई। गौरतलब है कि नक्सलियों ने लेवी की रकम अबूझमाड़, बीजापुर, सुकमा के कुछ सेफ स्थानों पर डंप कर रखी है। नक्सलियों ने कितना हथियार और पैसा डंप किया है इसकी ठीक-ठीक जानकारी किसी के पास नहीं है लेकिन नकद रकम करोड़ों में होने की आंशका है। नक्सलियों की आर्थिक कमर पर सर्जिकल स्ट्राइक: फोर्स ने इस अभियान के तहत नक्सलियो के भविष्य की नीतियों पर पानी फेर दिया है। नक्सल मुक्त बस्तर होने के बावजूद नक्सली फिर से बस्तर में नए सिरे से जमीन की तलाश में हैं ऐसे में यदि ये जखीरा पुलिस के हाथ नहीं लगता तो वे इसका उपयोग जमीन को फिर से बनाने में करते लेकिन इतनी बड़ी रकम हाथ से निकलने का मतलब है कि अब नक्सलियों के लिए राशन, रसद और नए लड़ाकों की भर्ती करना नामुमकिन हो जाएगा। कैश के साथ बरामद 28 प्रकार की सामग्रियों में विस्फोटक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं, जो नक्सलियों की आईईडी बनाने की यूनिट को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं।
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