किसानों के लिए इस साल खरीफ की खेती काफी चुनौतीपूर्ण रही। बुवाई के वक्त जहां सरकार ने खाद-बीज का पर्याप्त इंतजाम नहीं किया, तो अब कटाई के वक्त मौसम साथ नहीं दे रहा है। बीते दिनों बेमौसम बरसात ने जहां फसलों को भिगोया, वहीं अब दिन में उमस और रात में बढ़
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खरीफ सीजन की फसलों का अब अंतिम दौर चल रहा है। इस बीच मौसम की बदली चाल ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। गुलाबी ठंड की दस्तक के बावजूद इलाके में दिन में उमस महसूस की जा रही है। फसलों के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि गर्म तापमान में भूरा माहो की प्रजनन क्षमता में असामान्य बढ़ोतरी होती है। यही वजह है कि राजिम-नवापारा इलाके के खेतों में भूरा माहो का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी ओर फसलों पर माइट भी हमलावर है। फसलों पर इस कीट का प्रकोप भी अब सामान्य हो चला है। खासतौर पर पिछले 4-5 सालों में ऐसा एक भी साल नहजीं गुजरा है, जब इलाके में कहीं किसी खेत में माइट के प्रकोप की खबर सामने न आई हो। इन सब परिस्थितियों के बीच सरकार 14 नवंबर से धान खरीदी शुरू करने जा रही है। इधर, किसान अब तक फसल ही नहीं काट पाए हैं। उन्हें आसमान में छाए काले घने बादलों के हटने का इंतजार है। साथ में इस बात का डर भी है कि भूरा माहो और माइट इसी तेजी से फसलों को चट करते रहे, तो वे खेती की लागत भी निकाल पाएंगे या नहीं! इस संकट के वक्त पर किसानों को स्थानीय प्रशासन के साथ कृषि विभाग से भी कोई मदद नहीं मिल पा रही।
यही वजह है कि इलाके के किसानों को इस साल अपनी पूरी खेती के साथ 6 महीने की मेहनत और कमाई भी बर्बाद होती नजर आ रही है। राजिम। मोंथा के असर से खड़ी फसलें पहले ही लेटीं, उस पर भी भूरा माहो के प्रकोप से धान बर्बाद। गजेंद्र चंद्राकर , कृषि वैज्ञानिक मोंथा चक्रवात का वैसे तो ज्यादा असर सरगुजा संभाग और अंबागढ़ चौकी इलाके में देखने मिल रहा है। रायपुर संभाग के भी कुछएक जिलों में इसका असर देखने मिला है। जहां तक भूरा माहो की बात है, तो इसके पीछे बड़ा कारण घटिया कीटनाशकों का इस्तेमाल है। 100 एकएल प्रति एकड़ जैविक डोज के नाम पर जो खुराक खेतों को दी जा रही है, उसमें बड़ी मात्रा में घातक कीटनाशक मिलाने की आशंका है। यही वजह है कि खेतों में 2-3 स्प्रे के बाद भी भूरा माहो खत्म नहीं हो रहा है। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे बाजार में मिलने वाले किसी भी कीटनाशक के इस्तेमाल से बचें। इनकी जगह अनुसंधान आधारित कीटनाशकों ही इस्तेमाल करें। पेनीकल माइट का प्रकोप भी पिछले 4-5 सालों में आम हो गया है।
यह उन इलाकों में ज्यादा है, जहां धान की डबल फसल ली जाती है। इससे बचने के लिए किसानों को चाहिए कि बाली निकलने से पहले ही मकड़ी नाशक और कीटनाशक छिड़क दें। पेनीकल माइट: 100 एमएल एबामेक्टिन (1.8%), 500 एमएल प्रॉपरगाइट (57%), एक लीटर डाईकोफॉल (18%), 500 एमएल ईथियॉन (50%), 150 एमएल स्पाईरोमेसीफेन (22.9%), 250 एमएल हेक्सीथियाजोक्स (5.54%) और कोई एक मकड़ी नाशक के साथ 200 एमएल सील-जी का प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें। भूरा माहो: 100 एमएल थियामेथॉक्सम (12.6%) और 100 एमएल लैम्ब्डा साइहलोथ्रिन (9.5%) का प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव कर सकते हैं। मौसम ने भी किसानों पर रहम नहीं की। बीते दिनों आए मोंथा चक्रवात के असर से कई खेतों में खड़ी फसलें चादर की तरह बिछ चुकी हैं। इन फसलों में बालियां तक आ चुकी थीं। कई जगहों पर पानी निकालने किसानों खेत के बीचोबीच नाली बनाई है। फसल ऊपर से हरी क्योंकि जड़ों को चट कर रहे कीड़े: भूरा माहो ने इलाके में बड़े पैमाने पर तबाही मचा रहा है। खेतों में फसलें ऊपर से हरी नजर आ रही हैं। कीड़े फसलों को नीचे की ओर यानी जड़ों से चट कर रहे हैं। वहीं, पेनीकल माइट के प्रकोप से धान की बालियां के निकलते ही फसल ऊपर से सूखने लगी है।
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