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स्टाइपेंड बढ़ोतरी के बाद भी जूनियर डॉक्टरों का आंदोलन जारी, आज पांचवां दिन

एमबीबीएस इंटर्न और पीजी डॉक्टरों के स्टाइपेंड में बढ़ोतरी के बाद भी जूनियर डॉक्टरों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। पीजी डॉक्टरों का कहना है कि उनकी 17 सूत्रीय मांगों में स्टाइपेंड के अलावा कई महत्वपूर्ण मांगें लंबित हैं। इन्हीं मांगों को लेकर डॉक्टर चार दिन से आंदोलन कर रहे हैं और आज आंदोलन का पांचवा दिन है।

आंदोलन के कारण अंबेडकर अस्पताल समेत मेडिकल कॉलेज से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ा है और ओपीडी में मरीजों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में आधी रह गई है।

शासन ने एमबीबीएस इंटर्न का स्टाइपेंड बढ़ाकर 25 हजार रुपये प्रतिमाह किया है। इसके बाद अब पीजी मेडिकल डॉक्टरों के स्टाइपेंड में भी करीब 26 प्रतिशत तक वृद्धि का आदेश जारी किया है।

नई दरों के अनुसार पीजी प्रथम वर्ष का स्टाइपेंड 67,500 से बढ़कर 85,050 रुपये, द्वितीय वर्ष का 71,450 से 90,027 रुपये और तृतीय वर्ष का 74,600 से 93,996 रुपये किया गया है। नई दरें 1 अक्टूबर से लागू होंगी। इसके बावजूद डॉक्टरों का कहना है कि केवल स्टाइपेंड बढ़ाने से आंदोलन खत्म नहीं होगा।

जूनियर डॉक्टरों की प्रमुख मांग एमबीबीएस और पीजी के बाद लागू बांड व्यवस्था में बदलाव की है। डॉक्टरों के अनुसार एमबीबीएस और पीजी के बाद दो-दो वर्ष की बांड सेवा की व्यवस्था है। वे इसकी अवधि कम करने की मांग कर रहे हैं। साथ ही बांड की राशि भी घटाने की मांग है।

डॉक्टरों के अनुसार पीजी के लिए बांड राशि 50 लाख और एमबीबीएस के लिए 25 लाख रुपये है। एसोसिएशन बांड को खत्म करने या इसकी अवधि कम करने की मांग कर रहा है।

इसके अलावा पोस्ट-पीजी स्टाइपेंड, पीजी रेजिडेंट, बांडेड जूनियर रेजिडेंट और सीनियर रेजिडेंट के मानदेय में संशोधन, डीएम और एमसीएच सुपर स्पेशियलिटी रेजिडेंट के स्टाइपेंड में बदलाव और सुपर स्पेशियलिटी कैडर बनाने जैसी मांगें भी शामिल हैं। डॉक्टरों का कहना है कि सुपर स्पेशियलिटी कैडर बनने से प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ सकती है।

जूनियर डॉक्टरों को 29 सितंबर को सुबह 11:30 बजे स्वास्थ्य मंत्री ने चर्चा के लिए बुलाया है। डॉक्टरों को उम्मीद है कि बैठक में लंबित मांगों पर ठोस निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल ओपीडी का बहिष्कार जारी है।

यदि समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन को और तेज करने की चेतावनी पहले ही दी जा चुकी है। 28 सितंबर से इमरजेंसी समेत अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के बहिष्कार की चेतावनी भी एसोसिएशन दे चुका है। ऐसे में आंदोलन लंबा खिंचने पर मरीजों को इलाज के लिए अधिक इंतजार करना पड़ सकता है और मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में नियमित सेवाओं का दबाव बढ़ सकता है।

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