पिता के बाद बेटे बने राम, 28 साल लक्ष्मण बने विजय पटेल अब बेटे को देखकर गर्वित

रायपुर के दलदल सिवनी गांव की रामलीला में तीसरी पीढ़ी मंच पर उतर रही है। करीब 89 साल से चली आ रही इस परंपरा में कलाकार बदलते रहे, लेकिन रामलीला को आगे बढ़ाने का संकल्प नहीं बदला। यहां 5 साल के बच्चों से लेकर 70 साल के बुजुर्ग कलाकारों तक की भागीदारी है। सभी का उद्देश्य अपने पूर्वजों की इस धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।
इस रामलीला में किरदार निभाना सिर्फ अभिनय नहीं, परिवार की विरासत को संभालना भी है। बुजुर्ग कलाकार बच्चों को संवाद बोलने, वेशभूषा पहनने और मंच पर अभिनय करने की बारीकियां सिखाते हैं। नई पीढ़ी भी पढ़ाई और दूसरी जिम्मेदारियों के साथ रामलीला के लिए समय निकालती है। यही वजह है कि यहां राम, लक्ष्मण समेत कई पात्रों की परंपरा परिवारों के भीतर आगे बढ़ रही है।
लीलाधर साहू बताते हैं कि उनके बुजुर्गों ने उस दौर में रामलीला शुरू की थी, जब गांव में बिजली तक नहीं थी। पहले उनके चाचा राम बनते थे, फिर उन्होंने यह भूमिका निभाई और अब उनका बेटा राम का किरदार निभा रहा है। वे बेटे को संवाद, मेकअप और वेशभूषा से जुड़ी बातें सिखाते हैं। उनका कहना है कि किरदार निभाने के लिए परंपरा के साथ योग्यता, फिटनेस और धार्मिक भावना भी जरूरी है।
लीलाधर के बेटे दीपक साहू ने बताया कि पिछले 10-12 साल से रामलीला मंडली से जुड़े हैं और तीन साल से वे राम का किरदार निभा रहे हैं। उनके पिता भी राम बनते थे। दीपक ने कहा कि राम की भूमिका के लिए योग्यता देखी जाती है और चयन की प्रक्रिया लंबी होती है। वे फिलहाल NET की तैयारी कर रहे हैं। पढ़ाई के साथ रामलीला में भूमिका निभाना उनके लिए सौभाग्य की बात है।
हर्ष पटेल पिछले तीन साल से लक्ष्मण का किरदार निभा रहे हैं। वे 12वीं पास करने के बाद ITI कर रहे हैं। उनके पिता विजय पटेल ने लगातार 28 साल तक रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका निभाई है। विजय कहते हैं कि 28 साल तक मैंने लक्ष्मण का किरदार निभाया है। अब बेटे को यह किरदार निभाते देखकर अच्छा लगता है। वे चाहते हैं कि गांव के युवा इसी तरह रामलीला से जुड़ें और करीब नौ दशक से चली आ रही परंपरा कभी बंद न हो। सभी इस आयोजन को लेकर उत्साहित रहते हैं और पूरा गांव इस आयोजन में जुटता है।
71 साल के मुकुंद राम पिछले 35 साल से रावण का किरदार निभा रहे हैं। इससे पहले वे सीता, राजा दशरथ, परशुराम और बाली जैसे पात्रों की भूमिका भी निभा चुके हैं। लंबे अनुभव के बावजूद रामलीला के प्रति उनका उत्साह बना हुआ है। उन्होंने कहा कि अब रामलीला में नई पीढ़ी भी जुड़ रही है। लेकिन सभी को मेरा द्वारा किया गया रावण का किरदार पसंद आता है और मुझे खुद लीला में मंचन करना बेहतर पसंद है। इसलिए इतनी उम्र होने के बाद भी मैं मंडली से जुड़ा हूं और पिछले 35 सालों से मैं ही रावण का किरदार निभाते आ रहा हूं।
दलदल सिवनी की रामलीला मंडली इसलिए भी खास है क्योंकि यहां बच्चों के साथ बुजुर्ग आज भी अलग-अलग किरदार निभाते आ रहे हैं। 70 साल के आसाराम पटेल बताते हैं कि वे 10-12 साल की उम्र से रामलीला से जुड़े हैं। शुरुआत के दिनों में जब वे बच्चे थे तब अपने पूर्वजों के साथ वे परी बनते थे। और लीला की शुरुआत में आरती पूजन से भी रामलीला की शुरुआत होती थी। धीरे-धीरे उन्हें अलग-अलग किरदार करने का मौका मिला। अभी वे लीला में जोकर बनते हैं और लीला के बीच-बीच में बच्चों और लोगों का मनोरंजन करते हैं।
छन्नू लाल साहू ने कहा कि बुजुर्गों ने उस समय रामलीला की शुरुआत की थी, जब गांव में बिजली तक नहीं होती थी। सीमित सुविधाओं के बावजूद लोगों ने रामलीला का आयोजन शुरू किया और धीरे-धीरे यह गांव की परंपरा बन गई। छन्नू लाल साहू वर्ष 1977 से रामलीला मंडली में हैं। उन्होंने बालकांड में विश्वामित्र और लक्ष्मण समेत अलग-अलग किरदार निभाए हैं। वे बताते हैं कि गांव के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में रामलीला को लेकर उत्साह रहता है। नई पीढ़ी का जुड़ाव ही इस परंपरा को आगे बढ़ाने की सबसे बड़ी उम्मीद है।




