पायलट प्रोजेक्ट:जहर-कटाई से ठूंठ बने पेड़ों को दोबारा जिंदा करेंगे, इलाज होगा — जानिए क्या हुआ

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के करका इलाके में अवैध कब्जे के लिए जहर देकर और छाल काटकर (गर्डलिंग) सुखाए गए 3,500 से अधिक बेशकीमती पेड़ों को बचाने के लिए राज्य में पहला अनूठा प्रयोग होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर मृतप्राय पेड़ों की विशेष सर्जरी की जाएगी। इसके लिए बेंगलुरु के प्रसिद्ध ‘ट्री डॉक्टर’ विजय निशांत 22 अक्टूबर को धमतरी पहुंच रहे हैं। पायलट प्रोजेक्ट के तहत ट्री डॉक्टर आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक ‘ब्रिज ग्राफ्टिंग’ और प्राचीन ‘वृक्ष-आयुर्वेद’ पद्धति के मेल से साल, बीजा और तेंदू के ठूंठ बन रहे पेड़ों का उपचार करेंगे। जानकारों के अनुसार, उपचार के 30 से 45 दिनों के भीतर इन पेड़ों में नई जान लौटने लगेगी। करका क्षेत्र में अतिक्रमणकारियों ने तने के चारों ओर से छाल की पट्टी हटाकर पोषक तत्वों का प्रवाह रोक दिया था, जिससे पेड़ धीरे-धीरे सूख रहे थे। डीजीपीएस ड्रोन सर्वे और इसरो की सैटेलाइट इमेजरी के तुलनात्मक अध्ययन से खुलासा हुआ है कि क्षेत्र में अतिक्रमण 2016 के 22 हेक्टेयर से बढ़कर 2026 में 102.47 हेक्टेयर हो चुका है। बीते एक दशक में यहां 1.25 लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं, जिससे बाघ, हाथी, भारतीय विशाल गिलहरी और हॉर्नबिल जैसे संरक्षित वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। टाइगर रिजर्व में मैदानी अमले के 65 फीसदी पद खाली हैं। इसके बावजूद वन अमले ने मुस्तैदी दिखाते हुए बीते 4 वर्षों में 1,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया है। इस सख्ती के चलते वन संरक्षण दल पर अब तक 5 बार जानलेवा हमले भी हो चुके हैं। गोबर, मिट्टी और जूट की बोरी से होगी सर्जरी 3500 पेड़ों को पुनर्जीवित करने के लिए अपनाई जाने वाली ऑर्गेनिक ब्रिज ग्राफ्टिंग तकनीक पूरी तरह प्राकृतिक, वैज्ञानिक है। तने के क्षतिग्रस्त हिस्से के ऊपर और नीचे की सूखी छाल हटाई जाती है। अंदर की हरी, स्वस्थ कैंबियम परत दिखाई देने लगती है। देसी गाय के ताजे गोबर, चिकनी मिट्टी, फफूंदनाशक दवाओं को मिलाकर गाढ़ा लेप तैयार किया जाता है। गोबर प्राकृतिक एंटीसेप्टिक, इंसुलेटर की तरह काम करता है। यह घाव को फंगस, बैक्टीरिया के संक्रमण से सुरक्षित रखता है। लेप के बाद ग्राफ्टिंग कर पूरे हिस्से को जूट की बोरी से कसकर बांधा जाता है। जूट पानी सोखकर नमी बनाए रखता है। यह घाव को सूरज की अत्यधिक गर्मी, सीधी धूप से बचाता है। 30 से 45 दिनों में नई कोशिकाएं जुड़ जाती हैं। पेड़ फिर जीवित हो जाता है। साल 2022 में तोरेंगा रेंज में गर्डलिंग से प्रभावित पेड़ों को बचाने के लिए साधारण ब्रिज ग्राफ्टिंग तकनीक अपनाई गई थी। तब सफलता केवल 10 प्रतिशत मिली थी। इस बार प्रोजेक्ट वृक्ष फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. विजय निशांत के मार्गदर्शन में नई तकनीक से 3,500 पेड़ों की सर्जरी होगी। डॉ. विजय 22 अक्टूबर को पहुंच रहे हैं। करका में यह प्रयोग सफल रहा, तो इसी तर्ज पर जैतपुरी के 2,500 पेड़ों को भी बचाया जाएगा। -वरुण जैन, डिप्टी डायरेक्टर, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व

