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Home » NGO scam…CBI raids Social Welfare Department | NGO घोटाला…CBI ने 14 लोगों के खिलाफ जांच तेज की: समाज-कल्याण विभाग में दबिश, दस्तावेज ले गए अफसर: मंत्री-अफसरों पर भ्रष्टाचार का आरोप ​​​ – Chhattisgarh News
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NGO scam…CBI raids Social Welfare Department | NGO घोटाला…CBI ने 14 लोगों के खिलाफ जांच तेज की: समाज-कल्याण विभाग में दबिश, दस्तावेज ले गए अफसर: मंत्री-अफसरों पर भ्रष्टाचार का आरोप ​​​ – Chhattisgarh News

By adminOctober 7, 2025No Comments6 Mins Read
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छत्तीसगढ़ के NGO घोटाले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने तेज कर दी है। CBI के अधिकारी मना स्थित समाज कल्याण विभाग कार्यालय पहुंचे और डिप्टी डायरेक्टर से स्टेट रिसोर्स सेंटर (SRC) से संबंधित दस्तावेज मांगे।

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अधिकारियों ने NGO से जुड़े तीन बंडल दस्तावेजों की फोटो कॉपी भी ली। CBI ने कहा है कि इन दस्तावेजों की जांच की जाएगी और उसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में एक मंत्री और 7 IAS सहित कुल 14 लोगों का नाम सामने आया है।

CBI के अफसर इन गाड़ियों से समाज कल्याण विभाग के ऑफिस पहुंचे थे।

CBI के अफसर इन गाड़ियों से समाज कल्याण विभाग के ऑफिस पहुंचे थे।

अब पढ़िए NGO क्यों बनाया और कौन-कौन इसमें फाउंडर थे ?

दरअसल, 2004 में समाज कल्याण मंत्री रहीं रेणुका सिंह, रिटायर्ड IAS विवेक ढांढ, MK राउत, डॉ. आलोक शुक्ला, सुनील कुजूर, BL अग्रवाल, सतीश पांडे और पीपी श्रोती ने मिलकर 2 NGO बनाए। NGO के करप्शन में राज्य प्रशासनिक सेवा के 6 अधिकारियों को भी शामिल किया।

NGO को दिव्यांगों की भलाई के लिए बनाया था, जिसके तहत सुनने की मशीनें, व्हील चेयर, ट्राई साइकिल, कैलिपर और कृत्रिम अंग जैसी चीजें वितरण करना, अवेयर करना, उनकी देख-रेख करना था, लेकिन NGO को सिर्फ कागजों पर कर दिया। जमीन पर NGO गायब था।

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बिना मान्यता के चल रहा था NGO

मंत्री और IAS ने ऐसा सिस्टम बनाया था कि NGO को समाज कल्याण विभाग से मान्यता भी नहीं मिली, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के तहत NGO के खाते में करोड़ों रुपए ट्रांसफर हुए। ये सिलसिला करीब 14 साल तक चला।

नियम कहता है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी NGO में मेंबर नहीं हो सकता है, वह अवैध है, लेकिन मंत्री के साथ अधिकारियों ने मिलकर ये संस्था बना ली। NGO बनने के 45 दिन में चुनाव होना चाहिए था, लेकिन 17 साल तक कोई चुनाव नहीं हुआ। प्रबंधकारिणी की कोई बैठक नहीं हुई। इसका कोई ऑडिट नहीं किया गया।

दैनिक भास्कर की टीम उस शख्स के पास पहुंची थी, जिसने सबसे पहले इस घोटाले का सच उजागर किया।

दैनिक भास्कर की टीम उस शख्स के पास पहुंची थी, जिसने सबसे पहले इस घोटाले का सच उजागर किया।

अब पढ़िए कैसे खुला NGO घोटाले का राज

NGO के घोटाले की जानकारी 2016 में हुई थी। संविदा कर्मचारी कुंदन ठाकुर 2008 से मठपुरैना स्वावलंबन केंद्र (PRRC) में संविदा पर नौकरी कर रहे थे। इसी दौरान पता चला कि साथ में काम करने वाले कुछ कर्मचारी रेगुलर हो रहे हैं, तो वह भी अपनी नौकरी रेगुलर कराने के लिए समाज कल्याण विभाग में आवेदन देने पहुंचे।

इस दौरान कुंदन को पता चला कि वह पहले से सहायक ग्रेड-2 के पद पर पदस्थ हैं। उनके नाम पर दूसरी जगह से 2012 से वेतन निकल रहा है। ये सुनकर कुंदन सकते में आ गए। इसके बाद कुंदन ने RTI लगाई और पूरी जानकारी जुटाई।

RTI से पता चला कि उनके ही जैसे रायपुर में 14 और बिलासपुर में 16 कर्मचारी हैं, जिन्हें 2 जगहों पर पदस्थ दिखाया गया। हर महीने उनके नाम पर सैलरी निकाली जा रही है। कुंदन ने NGO स्कैम के शिकार दूसरे कर्मचारियों से संपर्क किया, लेकिन किसी ने साथ नहीं दिया। मामला कोर्ट पहुंचने पर कुंदन को नौकरी से निकाल दिया गया।

केन्द्र की योजनाओं का पैसा भी एक मुश्त निकालकर NGO को सौंपने का आदेश

केन्द्र की योजनाओं का पैसा भी एक मुश्त निकालकर NGO को सौंपने का आदेश

अब जानिए योजना, नियुक्ति, सैलरी पर कैसे हुआ स्कैम

कुंदन जब फाइलों के पन्ने पलटते हैं तो सबसे बड़ा राज सामने आता है। नामों की लिस्ट लंबी है, लेकिन कई नाम ऐसे हैं जो असल में कहीं काम ही नहीं कर रहे थे। दस्तावेज बताते हैं कि एक ही आदमी को 2 से 3 जगह पदस्थ दिखाया गया। यानी कुर्सी एक थी, लेकिन सैलरी 2 जगह से निकाली जा रही थी।

दस्तावेजों के मुताबिक NGO ने कागजों पर नई-नई नियुक्तियां की, लेकिन जमीन पर इन कर्मचारियों का कोई अस्तित्व ही नहीं था। नकली नियुक्तियां हुईं और फिर उनकी आड़ में फर्जी सैलरी निकाली गई। करीब 30 कर्मचारियों का सालाना वेतन 34 लाख रुपए दिखाया गया।

RTI से मिली जानकारी के मुताबिक केवल 5 साल में ये रकम बढ़कर 1 करोड़ 70 लाख रुपए से ज्यादा हो गई। 2004 से 2018 तक इस NGO के खाते में समाज कल्याण विभाग और उसकी शाखाओं से सीधा पैसा भेजा जाता रहा। योजनाओं का पैसा भी सीधे NGO के खाते में ट्रांसफर होता रहा।

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हाईकोर्ट के आदेश पर जांच में क्या-क्या मिला

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद तत्कालीन मुख्य सचिव अजय सिंह ने डॉ. कमलप्रीत सिंह को जांच सौंपी। यह जांच रिपोर्ट अब कोर्ट में शासन की ओर से पेश की गई है। भास्कर के पास इसकी कॉपी मौजूद है।

जांच में क्या मिला- SRC के रजिस्ट्रेशन के बाद से एक भी ऑडिट नहीं हुआ। फर्जी नियुक्तियां की गईं और कर्मचारियों को नकद में वेतन दिया गया।

सरकार का कोर्ट में जवाब- सेंटर माना भौतिक रूप से संचालित है। यहां 2012-2018 के बीच 4000 मरीजों को कृत्रिम अंग लगाए गए। 2014-15 में ऑडिट कराया गया था। भुगतानों में अस्पष्टता को स्वीकारा गया।

जांच में क्या मिला- याचिकाकर्ता कुंदन ठाकुर समेत अन्य कर्मचारियों का वेतन दूसरी शाखाओं से भी निकाला गया। खुद कर्मचारियों को इसकी जानकारी नहीं थी।

सरकार का कोर्ट में जवाब- सेंटर कुंदन ठाकुर की नियुक्ति का मूल विभाग स्वावलंबन केंद्र, मठपुरैना है। मार्च 2015 के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है कि उन्हें दो जगहों से मानदेय मिल रहा था। शेष भुगतान चेक के जरिए किया गया।

जांच में क्या मिला- NGO SRC में फर्जी नियुक्तियां की गईं।

सरकार का कोर्ट में जवाब- कार्यालय अवधि में 21 कर्मचारी नियमित सेवाएं दे रहे थे। 2017 से 11 कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग के जरिए निराश्रित निधि से भुगतान हुआ। बाकी 11 कर्मचारियों का भुगतान शासन से PRRC के जरिए किया जाता रहा। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI ने पुराने FIR पर दोबारा जांच शुरू कर दी है। इस जांच में जब बाकी जिलों का हिसाब सामने आएगा, तो कई और बड़े नाम एक्सपोज हो सकते हैं।

CBI की नजर अब इन पर

CBI की जांच अभी शुरुआती स्टेज में है। 15 दिन के भीतर सभी दस्तावेज जब्त करने का काम जारी है। अब जांच की आंच NGO के फाउंडर, RAS अफसर, जिला स्तर के अधिकारी, ऑडिट रोकने वाले अधिकारियों पर पड़ सकती है।

  • पूर्व मंत्री और NGO के फाउंडर IAS अफसर, जिनके नाम पंजीयन में दर्ज हैं।
  • वित्त और समाज कल्याण विभाग के RAS अफसर, जिनके हस्ताक्षर फंड ट्रांसफर में मिले हैं।
  • जिला स्तर के अधिकारी, जिनके जरिए केंद्र की स्कीम का पैसा NGO तक पहुंचा।
  • SRC में दस्तावेजों में नियुक्त कर्मचारी, जिनके नाम पर डबल सैलरी निकाली गई।
  • ऑडिट रोकने वाले अधिकारी, जिन्होंने 14 साल तक चुनाव और ऑडिट नहीं होने दिया।



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