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नवाखाई की शर्त पूरी होने पर राजा को लौटाया विजय-रथ:रूठे ग्रामीणों को मनाने राजसी ठाठ से पहुंचे;बस्तर दशहरे की बाहर रैनी की परंपरा निभाई — जानिए क्या हुआ

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में बस्तर दशहरे के तहत गुरुवार को बाहर रैनी की रस्म पूरी हुई। नवाखाई की शर्त पूरी होने पर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपाकर रखा गया 8 पहियों वाला विजय रथ राज परिवार को लौटा दिया गया। इससे पहले कमलचंद्र भंजदेव को शाही ठाठ-बाट के साथ गांव बुलाया गया। यहां उन्हें नए चावल और देसी गाय के दूध से बनी खीर खिलाई गई। इसके बाद ग्रामीण विजय रथ खींचकर राजमहल के सामने ले गए। इस परंपरा को देखने हजारों लोग जुटे। डेनमार्क और फ्रांस से भी पर्यटक पहुंचे। देखिए तस्वीरें… नवाखाई की रस्म निभाने के बाद ही मिला विजय रथ बस्तर दशहरे में बाहर रैनी की रस्म के दौरान राजा और ग्रामीणों के बीच एक पारंपरिक शर्त निभाई जाती है। बुधवार देर रात ग्रामीण राजमहल के सामने से विजय रथ अपने कब्जे में लेकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा आए थे। परंपरा के मुताबिक, रथ वापस पाने के लिए राज परिवार के सदस्य को ग्रामीणों के साथ नवाखाई की रस्म निभानी होती है। शुक्रवार को कमलचंद्र भंजदेव ने ग्रामीणों के साथ बैठकर नए चावल से बनी खीर खाई। नवाखाई की रस्म पूरी होने के बाद ग्रामीणों ने विजय रथ लौटाने की परंपरा निभाई। इस दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ देवी-देवताओं की पूजा की गई और मां दंतेश्वरी को भोग अर्पित किया गया। राजा को सजा देने की अनूठी परंपरा बस्तर दशहरे में भीतर रैनी और बाहर रैनी की रस्मों का विशेष महत्व है। भीतर रैनी के दौरान ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से राजा को सजा देते हैं और विजय रथ अपने कब्जे में ले लेते हैं। इसके बाद राजा को पूरे राजसी ठाठ-बाट के साथ गांव बुलाया जाता है। ग्रामीण उनके सामने नवाखाई खाने की शर्त रखते हैं। कमलचंद्र भंजदेव के मुताबिक, इस बार नवाखाई के लिए बस्तर रियासत की जमीन पर उपजे नए चावल और देसी गाय के दूध से खीर बनाई गई। रियासत काल से चली आ रही परंपरा के मुताबिक, ग्रामीण राजा से रूठकर विजय रथ चुरा ले जाते हैं। इसके बाद राजा उन्हें मनाने गांव पहुंचते हैं और उनके साथ नवाखाई खाते हैं। 55 गांवों के माड़िया समुदाय की अहम भूमिका करीब 618 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में किलेपाल, बास्तानार सहित 55 गांवों के माड़िया समुदाय की अहम भूमिका रहती है। समुदाय के ग्रामीण 8 चक्कों वाले विजय रथ को राजमहल के सामने से ले जाकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा देते हैं। परंपरा के मुताबिक, पहले राजा को हाथी-घोड़ों के साथ पूरे राजसी ठाठ-बाट में कुम्हड़ाकोट लाया जाता था। इस बार भी कमलचंद्र भंजदेव घोड़े वाले रथ के साथ पहुंचे। नवाखाई की रस्म पूरी होने के बाद ग्रामीणों ने रस्सियों के सहारे विजय रथ को खींचकर राजमहल तक पहुंचाया। इस दौरान परंपरा के अनुसार राजा रथ के आगे चले और ग्रामीण पीछे से रथ खींचते हुए पहुंचे। आतिशबाजी के बीच राजमहल पहुंचा विजय रथ कुम्हड़ाकोट के जंगल से विजय रथ की वापसी के दौरान उत्सव का माहौल रहा। आतिशबाजी के बीच राज परिवार और रथ का स्वागत किया गया। इस रस्म में क्षेत्र के अलग-अलग देवी-देवताओं के देव विग्रह भी शामिल हुए। सैकड़ों ग्रामीणों ने मिलकर दो मंजिला विजय रथ को खींचा और राजमहल के सामने पहुंचाया। रथ की ऊंचाई को देखते हुए शहर में प्रवेश के दौरान कुछ समय के लिए बिजली आपूर्ति बंद रखी गई, ताकि रथ हाईटेंशन तारों के संपर्क में न आए। सुरक्षा के लिए बरती गई इस सावधानी के बीच विजय रथ की वापसी की रस्म पूरी हुई। बस्तर की संस्कृति देखने विदेशों से पहुंचे पर्यटक बस्तर दशहरे की अनूठी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को देखने देश-विदेश से पर्यटक पहुंच रहे हैं। गुरुवार को डेनमार्क और फ्रांस से आए पर्यटकों ने बाहर रैनी की रस्म को करीब से देखा। विजय रथ की वापसी, नवाखाई की परंपरा और ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी उनके लिए आकर्षण का केंद्र रही। बस्तर दशहरा सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां की परंपराओं, देवी-देवताओं और समुदायों की सामूहिक आस्था का प्रतीक है। बाहर रैनी की रस्म में सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरे उत्साह और लोगों की भागीदारी के साथ निभाई जाती है। …………………. बस्तर दशहरे से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… बस्तर दशहरा…ग्रामीणों ने चुराया विजय रथ: भीतर रैनी की रस्म निभाई, आज नवाखाई के बाद लौटेगा रथ, पहिए के नीचे दबने से ग्रामीण की मौत बस्तर दशहरा में 21 अक्टूबर की रात रथ चुराकर भीतर रैनी की रस्म निभाई गई। माता दंतेश्वरी के छत्र के साथ 8 चक्कों वाले दो मंजिला विजय रथ की परिक्रमा कराई गई। इस दौरान रथ के चक्के के नीचे आने से एक ग्रामीण की मौत हो गई। पढ़ें पूरी खबर…

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