जशपुर: रास्ते में खराब हुई एम्बुलेंस, 2 घंटे देरी से पहुंची, गर्भवती ने तोड़ा दम

जशपुर जिले के सुदूरवर्ती आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली का एक गंभीर मामला सामने आया है। बगीचा विकासखंड के महनई गांव में समय पर एम्बुलेंस न पहुंचने और स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बंद होने के कारण एक गर्भवती पहाड़ी कोरवा महिला की मौत हो गई। मृतका की पहचान शोभनी बाई (लगभग 45 वर्ष), पति रुदनू राम, निवासी गासेबन बस्ती, महनई के रूप में हुई है, जिसकी प्रसव पीड़ा के दौरान इलाज न मिल पाने से जान चली गई।

परिजनों के अनुसार, रविवार दोपहर करीब 3 बजे शोभनी बाई को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, जिसके बाद शाम करीब 4 बजे एम्बुलेंस के लिए फोन किया गया। सूचना मिलने पर एम्बुलेंस रवाना तो हुई, लेकिन रास्ते में ही खराब हो गई। वाहन में आई खराबी के कारण एम्बुलेंस को गांव पहुंचने में लगभग दो घंटे लग गए। जब तक एम्बुलेंस गांव पहुंची, तब तक महिला की मौत हो चुकी थी।
मृतका के रिश्तेदार जीतन राम पहाड़िया ने बताया कि एम्बुलेंस के लिए फोन करने के लगभग दो घंटे बाद वाहन घर पहुंचा। जब उन्होंने देरी का कारण पूछा तो एम्बुलेंस कर्मियों ने रास्ते में वाहन खराब होने की बात बताई। इस घटना ने आपातकालीन सेवा के लिए तैनात एम्बुलेंस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर दूरस्थ गांवों के मरीजों को आपात स्थिति में मिलने वाली मदद को लेकर।
इस मामले में एक और गंभीर तथ्य सामने आया है। महनई गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद है, लेकिन वहां डॉक्टर और कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण स्वास्थ्य केंद्र बंद पड़ा है। यानी गांव में स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद ग्रामीणों को तत्काल इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है, जिससे उन्हें आपात स्थिति में और भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
बगीचा बीएमओ ने इस संबंध में बताया कि 102 और 108 एम्बुलेंस सेवाओं का नियंत्रण रायपुर से होता है और इनका संचालन एक निजी कंपनी करती है, इसलिए एम्बुलेंस संचालन की जिम्मेदारी सीधे स्वास्थ्य विभाग की नहीं है। वहीं, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि महनई का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टर और कर्मचारियों के अभाव में बंद है। हालांकि, उन्होंने जल्द ही स्वास्थ्य केंद्र को पूर्व की तरह संचालित करने की बात कही है।
महनई की यह घटना सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़े अंतर को उजागर करती है। एक तरफ गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, लेकिन वह निष्क्रिय पड़ा है। दूसरी तरफ, आपातकालीन स्थिति में जिस एम्बुलेंस सेवा से मदद की उम्मीद थी, वही रास्ते में खराब हो गई और महिला को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका। यह घटना दूरस्थ आदिवासी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की जिम्मेदारी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्टाफ की कमी, एम्बुलेंस के नियमित रखरखाव और आपातकालीन सेवा में देरी की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
पहाड़ी कोरवा समुदाय की एक महिला की इस दुखद मौत ने महनई की स्वास्थ्य व्यवस्था और एम्बुलेंस सेवा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या केवल जल्द स्वास्थ्य केंद्र शुरू करने का आश्वासन दिया जाएगा या वास्तव में व्यवस्था में सुधार भी होगा।




