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कांकेर जिले के नरहरपुर विकासखंड के जामगांव में ग्रामीणों ने मतांतरण के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। गांव के प्रवेश द्वार पर पास्टर, पादरियों और धर्मांतरित लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध का बोर्ड लगाया गया है। यह जिले का 13वां गांव है, जहां इस तरह का प्रतिबं
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इससे पहले नरहरपुर तहसील के चारभाठा गांव में भी अक्टूबर में ऐसा ही बोर्ड लगाया गया था। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में मतांतरण के कारण आदिवासी समाज के रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
नहीं कर रहे ईसाई धर्म का विरोध- ग्रामीण
ग्रामीण खेमन नाग ने बताया कि जामगांव में 14 परिवार दूसरे धर्म को मानने लगे हैं, जिससे गांव का माहौल खराब हो रहा है। वहीं गायत रमेश उइके ने स्पष्ट किया कि वे ईसाई धर्म का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि भोले-भाले ग्रामीणों के मतांतरण का विरोध कर रहे हैं।
आदिम संस्कृति के लिए खतरा है धर्मांतरण
प्रमोद कुंजाम ने कहा कि आदिवासियों को प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराना हमारी संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहा है और आदिम संस्कृति के लिए खतरा है। ग्राम सभा के प्रस्ताव के माध्यम से पास्टर, पादरियों और बाहर से आने वाले मतांतरण व्यक्तियों के धार्मिक व धर्मांतरण आयोजन के उद्देश्य से प्रवेश पर रोक लगाई गई है।
कफन-दफन को लेकर विवाद हुआ था बवाल
बोर्ड पर ग्रामीणों ने उल्लेख किया है कि पेसा अधिनियम 1996 लागू है, जिसके नियम चार (घ) के तहत सांस्कृतिक पहचान और रूढ़िवादी संस्कृति के संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। बता दें कि कुछ महीने पहले गांव में एक मतांतरित परिवार के सोमलाल राठौर की मौत के बाद कफन-दफन को लेकर बवाल हुआ था।
जिसके बाद ग्राम सभा में पास्टर-पादरी के गांव में आने पर सख्त प्रतिबंध का प्रस्ताव पारित किया गया था। संविधान की पांचवीं अनुसूची में शामिल क्षेत्रों में ग्राम सभा को मान्यता प्राप्त है, जो अपनी संस्कृति और परंपराओं की सुरक्षा के लिए निर्णय लेने में सक्षम है।
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