कोंडागांव के शिक्षक राजेंद्र राव ने एक अद्वितीय कलाकृति बनाई है, जिसमें उन्होंने एक दुपट्टे पर पूरी रामायण को चित्रों के माध्यम से उकेरा है। यह कलाकृति उनकी श्रद्धा, कला और धैर्य का संगम है, जिसने भारतीय कला-संस्कृति प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया ह
.
लगभग 5 फीट × 3 फीट आकार के कोसे के दुपट्टे को कैनवास के रूप में इस्तेमाल किया गया है। राजेंद्र राव ने इसे केवल पहनावे का हिस्सा नहीं, बल्कि एक “चित्रकथात्मक माध्यम” बनाया है, जो संवाद का जरिया बन गया है।
इस दुपट्टे पर रामायण के सात कांड और लगभग 24,000 श्लोकों की कथाओं को चित्रों के जरिए दर्शाया गया है। इसमें बाल्यकाल, वनवास, सुग्रीव-संबंध, लंका युद्ध, रावण वध और राज्याभिषेक जैसे सभी महत्वपूर्ण प्रसंगों को कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।

एक्रेलिक रंगों का इस्तेमाल
चित्रों को उकेरने के लिए एक्रेलिक रंगों का इस्तेमाल किया गया है, ताकि वे टिकाऊ रहें और धोने पर कम प्रभावित हो। राजेंद्र राव ने इस कलाकृति को तैयार करने में लगभग सात दिन का समय लिया। उनकी शैली में स्थानीय बस्तर की पारंपरिक झलक भी शामिल है, जो आभूषणों, पोशाकों और प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से लोक सांस्कृतिक सौंदर्य जोड़ती है।
युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा
राजेंद्र राव के अनुसार, इस कलाकृति का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को रामायण और उसके आदर्शों से परिचित कराना है। वे भारत की सांस्कृतिक धरोहर, लोककला और धार्मिक ग्रंथों का संरक्षण करना चाहते हैं, साथ ही चित्र माध्यम से कथा को सहज और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना चाहते हैं, ताकि जो लोग ग्रंथ नहीं पढ़ते, वे भी कहानी समझ सकें।

33 सालों से कर रहे चित्रकारी
राजेंद्र राव पिछले लगभग 33 सालों से इसी तरह की चित्रकारी करते आ रहे हैं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर अपनी चित्रकारी वाले दुपट्टों और अन्य कलाकृतियों को स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया है। उन्होंने इस विशेष कलाकृति को प्रदर्शनी के बजाय सेवा भाव और साझा संस्कृति के उद्देश्य से तैयार किया है।
यह कलाकृति एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि परंपराएं और धर्मग्रंथ केवल किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें कला और विभिन्न माध्यमों से भी जीवंत रखा जा सकता है। यह सांस्कृतिक जागृति और कला के माध्यम से विरासत को आगे बढ़ाने का एक प्रयास है।
<
