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Home » A new experiment in sugarcane cultivation, seeds were prepared using the I-Word method, resulting in 80% less seeds being required. | गन्ने की खेती में नया प्रयोग, आई वर्ड पद्धति से बीज तैयार किए, इससे 80% बीज कम लगे‎ – Raipur News
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A new experiment in sugarcane cultivation, seeds were prepared using the I-Word method, resulting in 80% less seeds being required. | गन्ने की खेती में नया प्रयोग, आई वर्ड पद्धति से बीज तैयार किए, इससे 80% बीज कम लगे‎ – Raipur News

By adminDecember 22, 2025No Comments3 Mins Read
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कबीरधाम जिले के ग्राम‎ दुल्लापुर-रानीसागर के किसान भुपेन्द्र‎ डहरिया ने खेती में आधुनिक विज्ञान‎ और तकनीक का सही उपयोग करते हुए‎ इसे केवल आजीविका का साधन नहीं,‎ बल्कि लाभकारी व्यवसाय बना लिया।‎ एमएससी हॉर्टिकल्चर की पढ़ाई कर‎ चुके भुपेन्द्र ने परंपरा

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गन्ना की खेती में भुपेन्द्र ने बीज‎ उत्पादन की एक नई और प्रभावी तकनीक‎ अपनाई है। उन्होंने आई वर्ड यानी गन्ने की‎ गठान काटकर स्वयं बीज तैयार किए। इस‎ तकनीक से उन्हें लगभग 80 प्रतिशत तक‎ बीज की बचत हुई। दरअसल, गन्ना के‎ गठान के हिस्सा आंख की तरह नजर‎ आता है। इसलिए इसे आई वर्ड कहा जाता‎ है।

आधुनिक तकनीक में किसान सिर्फ‎ गठान के इसी हिस्से को काटकर उसका‎ बीज के रूप में इस्तेमाल करते हैं। बाकी‎ का हिस्सा बेचकर अतिरिक्त आय ली जा सकती है।‎

युवा किसान भुपेन्द्र के पास 8 एकड़‎ पैतृक जमीन है, जबकि 20 एकड़ भूमि ‎उन्होंने लीज पर लेकर खेती की। उन्होंने‎ वर्ष 2017 में खेती की शुरुआत की थी। ‎वर्तमान में वे 3 एकड़ में केला, 3 एकड़‎ में गन्ना और शेष भूमि में धान की खेती‎ कर रहे हैं। जहां पहले प्रति एकड़ गन्ना‎ बीज पर करीब 15 हजार रुपए खर्च होते‎ थे, वहीं अब यह खर्च घटकर मात्र 4000‎ रुपए प्रति एकड़ रह गया है।

एक गन्ना पौधे‎ से लगभग 20 बीज तैयार किए जा सकते‎ हैं, जो करीब 8 महीने में पूरी तरह तैयार‎ हो जाते हैं। इसके साथ ही उन्होंने गन्ना की‎ लाइन विधि और गैप पद्धति से बुवाई कर‎ पैदावार में वृद्धि की।‎ इससे 500-600 क्विंटल प्रति एकड़‎ उत्पादन ले रहे हैं। आधुनिक तकनीक के‎ कारण उन्हें गन्ना की खेती से प्रति एकड़‎ औसतन दो लाख रुपए तक की कमाई हो‎ रही है।

मिट्टी और पानी की बचत के लिए‎ उन्होंने ड्रिप इरिगेशन और फसल अवशेष‎ मल्चिंग तकनीक को भी अपनाया, जिससे‎ फसल की गुणवत्ता बेहतर हुई और रोग‎ प्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि हुई। केले की‎ खेती में भी उन्होंने नवाचार किया।‎ जैविक खाद के प्रयोग से लागत कम हुई‎ और उत्पादन में सुधार आया।

उन्होंने‎ बताया कि गन्ना के साथ सब्जियों और‎ गेहूं, मटर-मक्का की अंतर बुवाई कर‎ मिश्रित खेती को बढ़ावा दिया। इससे‎ उनकी आय के स्रोत बढ़े और खेती से‎ जुड़ा जोखिम भी कम हुआ। भूमि की‎ उर्वरता बनाए रखने के लिए भुपेन्द्र‎ डहरिया जैविक खाद और नीम आधारित‎ कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। साथ‎ ही वे फसल चक्र अपनाकर मिट्टी की‎ सेहत को सुरक्षित रख रहे हैं।‎

उनकी सफलता से क्षेत्र के अन्य‎ किसान भी प्रेरित हो रहे हैं। कबीरधाम‎ जिले के पोंड़ी, बोड़ला, लोहारा, मुंगेली,‎ बेमेतरा सहित कई गांवों के किसान उनके‎ खेतों का निरीक्षण कर आधुनिक तकनीकों‎ को अपनी खेती में अपना रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गन्ना बीज‎ उत्पादन की यह तकनीक और लाइन विधि‎ से बुवाई को व्यापक रूप से अपनाया‎ जाए, तो राज्य में उत्पादन बढ़ने के साथ‎ किसानों की आय में भी सुधार हो सकती‎ है।

भुपेन्द्र का कहना है कि खेती अब‎ केवल परंपरा नहीं रही, बल्कि विज्ञान और‎ तकनीक के माध्यम से इसे अधिक‎ लाभकारी बनाया जा सकता है।‎



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