Uncategorized

अटल विवि की शोध टीम को पेटेंट, घोल का पीएच अब नहीं बिगड़ेगा

अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय की शोध टीम ने रासायनिक और जैविक प्रयोगों में घोल का पीएच तय स्तर पर बनाए रखने के लिए स्वचालित प्रणाली विकसित की है। इस शोध को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने मान्यता देते हुए पेटेंट प्रदान किया है। आविष्कार में डा.लतिका भाटिया, दीया गोयल, अभय पटेल और नायब उल मलिक शामिल हैं। यह तकनीक घोल की स्थिति पर लगातार नजर रखकर जरूरत के अनुसार स्वतः सुधार करती है।

घोल में निर्धारित पीएच बनाए रखने की स्वचालित पीएच परिशुद्धता प्रणाली एवं विधि नामक आविष्कार के लिए पेटेंट प्रदान किया गया है। इस शोध में डा.लतिका भाटिया, दिया गोयल और अभय पटेल अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, कोनी के सूक्ष्मजीव विज्ञान एवं जैव सूचना विज्ञान विभाग से जुड़े हैं। नायब उल मलिक शासकीय ई. राघवेंद्र राव स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय, बिलासपुर के भौतिकी विभाग से जुड़े हैं।

डा.लतिका ने बताया कि यह प्रणाली घोल का पीएच और तापमान लगातार मापती रहेगी। इसमें लगे सेंसर वास्तविक समय में जानकारी नियंत्रक तक पहुंचाएंगे। यदि पीएच तय स्तर से कम या ज्यादा होगा तो प्रणाली अपने आप सुधारक द्रव्य की मात्रा नियंत्रित करेगी। लक्ष्य स्तर प्राप्त होते ही उसका प्रवाह बंद हो जाएगा। इससे बार-बार हाथ से जांच करने की जरूरत कम होगी और अधिक मात्रा में अम्ल-क्षार डालने से होने वाली गलती भी रोकी जा सकेगी।

इस प्रणाली में घोल रखने के लिए पात्र, सुधारक द्रव्य रखने का भंडार, द्रव्य पहुंचाने वाली व्यवस्था, पीएच मापक और तापमान मापक सेंसर शामिल हैं। उपयोगकर्ता इच्छित पीएच पहले निर्धारित कर सकता है। नियंत्रक सेंसर से मिली जानकारी की तुलना तय स्तर से करेगा। अंतर मिलने पर सुधारक द्रव्य डाला जाएगा। लक्ष्य स्तर मिलते ही यह प्रक्रिया रुक जाएगी। पूरी जानकारी प्रदर्शन पट पर देखी जा सकेगी।

शोध की खासियत यह है कि प्रणाली सुधारक द्रव्य एक साथ अधिक मात्रा में डालने के बजाय जरूरत के अनुसार नियंत्रित अंतराल में डाल सकती है। लक्ष्य पीएच के करीब पहुंचने पर डालने की गति और अवधि कम हो जाती है। इससे तय स्तर से आगे निकलने की आशंका घटती है। शोध में पहले डाले गए द्रव्य और पीएच में हुए बदलाव का विवरण सुरक्षित रखने तथा उसके आधार पर नियंत्रण प्रक्रिया को बेहतर करने की व्यवस्था भी बताई गई है।

डा.भाटिया ने बताया गया कि इस तकनीक का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। रासायनिक उद्योग में उत्पादन प्रक्रिया के दौरान पीएच नियंत्रित करने, अपशिष्ट जल के उपचार, दवा निर्माण, जल शुद्धिकरण और जैव प्रौद्योगिकी प्रयोगशालाओं में इसका उपयोग संभव है। खाद्य एवं पेय पदार्थों की किण्वन प्रक्रिया, कृषि में पोषक घोल तथा पौधों की जल-आधारित खेती में भी पीएच संतुलन बनाए रखने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button