नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। प्रदेश में निर्माण कार्यों की रफ्तार पर अचानक ब्रेक लग गया है। गैस आपूर्ति में कमी और खाड़ी क्षेत्र में जारी युद्ध के असर ने अब सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
सीमेंट, स्टील, डामर, बिजली वायर और अन्य निर्माण सामग्री के दामों में 20 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे न केवल निर्माण लागत में लगभग 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, बल्कि सड़क निर्माण सहित कई परियोजनाएं ठप पड़ने की कगार पर पहुंच गई हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि प्रदेश में डामरीकरण के करीब 90 प्रतिशत काम बंद हो चुके हैं।
डामर की कमी से सड़क निर्माण लगभग ठप
प्रदेश में सबसे ज्यादा असर सड़क निर्माण कार्यों पर देखने को मिल रहा है। बिटुमेन (डामर) की भारी कमी के कारण अधिकांश निर्माण एजेंसियां काम रोकने को मजबूर हैं। जिन ठेकेदारों के पास पहले से डामर का स्टॉक उपलब्ध है, वही सीमित स्तर पर कार्य कर पा रहे हैं। नई परियोजनाएं शुरू नहीं हो पा रही हैं, जबकि पुराने काम भी बेहद धीमी गति से चल रहे हैं।
निर्माण सामग्री के दामों में भारी उछाल
पिछले दो महीनों में निर्माण सामग्री की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। स्टील की कीमत 55 हजार रुपये प्रति टन से बढ़कर 65 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है। सीमेंट की बोरी 270 रुपये से बढ़कर 300 रुपये हो गई है। वहीं बिटुमेन की कीमत 50 हजार रुपये प्रति टन से बढ़कर 84 हजार रुपये तक पहुंच गई है। इसके अलावा गिट्टी, टाइल्स और अन्य निर्माण सामग्री भी महंगी हो गई है, जिससे कुल निर्माण लागत में लगातार वृद्धि हो रही है।
गैस संकट से उद्योगों का उत्पादन प्रभावित
- गैस सिलेंडर की कमी ने प्रदेश के उद्योगों की कमर तोड़ दी है। मिनी स्टील प्लांट, रोलिंग मिल और स्पंज आयरन इकाइयों को पर्याप्त गैस आपूर्ति नहीं मिल पा रही है। इसके चलते कटिंग और वेल्डिंग जैसे जरूरी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। उद्योग संचालकों के अनुसार उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। कई इकाइयों को मजबूरी में सीमित कार्य करना पड़ रहा है।
- मिनी स्टील प्लांट एसोसिएशन के महासचिव मनीष धुप्पड़ के अनुसार, “स्थिति इतनी खराब है कि उद्योगों को एक भी गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यदि जल्द आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो उत्पादन और अधिक गिर सकता है।”
ब्लैक मार्केट में दोगुनी कीमत पर मिल रहे सिलेंडर
- गैस की कमी का फायदा कालाबाजारी करने वाले उठा रहे हैं। जहां सामान्य समय में कमर्शियल गैस सिलेंडर लगभग 2100 रुपये में मिल जाता था, वहीं अब इसकी कीमत ब्लैक मार्केट में 4000 से 5000 रुपये तक पहुंच गई है। उद्योगों को मजबूरी में महंगे दामों पर सिलेंडर खरीदना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत और बढ़ रही है।
- उरला एसोसिएशन के अध्यक्ष अश्विन गर्ग ने बताया कि एमएसएमई और अन्य लघु उद्योगों को पर्याप्त गैस नहीं मिल रही है, जिससे उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और राजस्व पर भी असर पड़ सकता है।
150 रोलिंग मिल और 120 स्टील प्लांट संकट में
प्रदेश में लगभग 150 रोलिंग मिल, 120 मिनी स्टील प्लांट और 70 स्पंज आयरन इकाइयां इस समय संकट का सामना कर रही हैं। इन उद्योगों में गैस सिलेंडर की खपत काफी अधिक होती है। कुछ इकाइयों को प्रतिदिन एक सिलेंडर की जरूरत होती है, तो कुछ को 5 से 10 सिलेंडर तक की आवश्यकता पड़ती है। मौजूदा स्थिति में यह मांग पूरी नहीं हो पा रही है।
ठेकेदारों ने उठाई रेट रिवाइज की मांग
- निर्माण लागत में बढ़ोतरी के चलते ठेकेदारों ने सरकार से टेंडर रेट में संशोधन की मांग की है। ठेकेदारों का कहना है कि पुराने रेट पर काम करना अब घाटे का सौदा बन गया है। यदि जल्द ही रेट रिवाइज नहीं किया गया तो कई निर्माण कार्य पूरी तरह बंद हो सकते हैं।
- कॉन्ट्रैक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष बीरेश शुक्ला के अनुसार, “लगातार बढ़ती लागत के कारण काम करना मुश्किल हो गया है। सरकार से राहत नहीं मिली तो निर्माण कार्य पूरी तरह ठप हो सकते हैं।”
एस्केलेशन का है प्रावधान
पीडब्ल्यूडी सचिव कमलप्रीत सिंह ने बताया कि टेंडर प्रक्रिया में एस्केलेशन का प्रावधान होता है, जिससे लागत बढ़ने की स्थिति में ठेकेदारों को कुछ राहत मिलती है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि मौजूदा परिस्थितियों में निर्माण कार्य प्रभावित हो रहे हैं और सरकार इस पर नजर बनाए हुए है।
बड़े प्रोजेक्ट भी हो रहे प्रभावित
महंगाई और सामग्री की कमी का असर बड़े प्रोजेक्ट्स पर भी साफ दिखाई दे रहा है। स्टेशन से सद्दाणी दरबार तक बनने वाला एक्सप्रेस-वे रिन्यूअल प्रोजेक्ट, जिसकी लागत करीब 17 करोड़ रुपये है, डामर की कमी के कारण शुरू नहीं हो पा रहा है। वहीं कचना ओवरब्रिज की लागत 1.60 करोड़ रुपये से बढ़कर 2.30 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।
लघु उद्योगों पर बढ़ा दबाव
छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। इन उद्योगों को हर महीने 15 से 25 गैस सिलेंडर की जरूरत होती है, लेकिन वर्तमान में पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही है। केंद्र सरकार द्वारा सप्लाई बढ़ाने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है।
आगे क्या?
यदि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई और निर्माण सामग्री के दामों पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो प्रदेश के विकास कार्यों पर गंभीर असर पड़ सकता है। सड़क निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक उत्पादन सभी क्षेत्रों में मंदी की स्थिति बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और संबंधित एजेंसियों को त्वरित समाधान निकालना होगा, अन्यथा आने वाले समय में हालात और बिगड़ सकते हैं।
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