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वर्ष 2025-26 के बजट के खर्च का पैटर्न देखें तो एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है। सड़क, पुल और घर-घर नल जैसे बुनियादी कामों पर खर्च कम हुआ है। सरकार का फोकस महतारी वंदन, राशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर है, इन विभागों ने बजट से ज्यादा खर्च किया है। पीएचई जैसा महत्वपूर्ण विभाग अपने बजट का 81% हिस्सा खर्च ही नहीं कर पाया, पीडब्ल्यूडी की रफ्तार भी आधी से कम (48%) रही। खर्च के मामले में वन व जलवायु परिवर्तन और पर्यटन जैसे विभाग भी पीछे दिख रहे हैं। 2025-26 में मुख्य और अनुपूरक मिलाकर प्रदेश का बजट 2 लाख करोड़ रुपए था। ये 2024-25 के 1.6 लाख करोड़ रुपए से 25% ज्यादा था। प्रदेश में भाजपा सरकार ने सब्सिडी तेजी से बढ़ाई है। 2017-18 में 10 हजार करोड़, कांग्रेस की सरकार ने 25 हजार के आसपास और अब भाजपा सरकार 40 हजार करोड़ तक दे रही है। खर्च बढ़ा है लेकिन काम की रफ्तार ठप है। सीनियर अफसर खराब वर्क कल्चर को जिम्मेदार बताते हैं। पीडब्ल्यूडी और पीएचई में डीपीआर तैयार करने, तकनीकी और प्रशासकीय स्वीकृति, टेंडर आमंत्रण और फिर लोएस्ट बिडर (एल-1) के चयन में ही 4 से 6 महीने निकल जाते हैं, जिससे वित्तीय वर्ष के अंत तक बजट का इस्तेमाल नहीं हो पाता है। पीडब्ल्यूडी में कुछ काम जमीन अधिग्रहण और वन विभाग के क्लियरेंस के कारण सालों तक अटके रहते हैं। योजना पानी-पानी… घर-घर जल की योजना ठप बस्तर, कांकेर, दुर्ग, कवर्धा, गरियाबंद, रायगढ़, सूरजपुर जैसे जिलों में पानी में फ्लोराइड ज्यादा होने से लोग बीमार हो रहे हैं लेकिन पीएचई ने सालों बाद भी इसका उपाय नहीं किया है। काम के प्रस्ताव भेजने की रफ्तार भी सुस्त बताई गई है। बावजूद विभाग को दिए गए बजट का 81% खर्च ही नहीं किया है। पीएचई ईएनसी केके मरकाम के अनुसार, 2025-26 में केंद्र से एक रुपया भी नहीं मिला। 2023-24 में केंद्र से 2885 करोड़ मिले थे, जो 2024-25 में घटकर 191 करोड़ रह गए। खेत में जमा पानी पीते हैं कारकानार के ग्रामीण नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र का कारकानार गांव में करीब 50 घरों और 250 आबादी वाले इस गांव में ग्रामीण झरिया और नालों का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। महिलाएं रोज 2-3 किमी पहाड़ी रास्ता पार कर पानी लाती हैं। जल जीवन मिशन के तहत नल लगा दिए गए हैं लेकिन पानी अब तक नहीं पहुंचा है। ग्राम पंचायत झारावाही के पूर्व सरपंच लच्छूराम कोर्राम कहते हैं कि गांव के लोग खेत में रुका हुआ पानी पीते हैं। यही पानी मवेशी भी पीते हैं। सुस्ती… पिछले साल से 3 गुना खर्च की प्लानिंग पीडब्ल्यूडी द्वारा बजट खर्च नहीं किए जाने के सवाल पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा, किसी भी वर्ष में बजट का लगभग एक तिहाई ही खर्च होता है। बजट की पूरी राशि खर्च नहीं हुई तो इसे विभाग की सुस्ती मानना गलत है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में विभाग को 551.42 करोड़ रुपए मिले। इससे 72 सड़कें और 6 पुल बनने थे। 2024-25 में पीडब्ल्यूडी को 2623 करोड रुपए मिले उसमें 400 सड़कें 37 पुल बनने थे। वित्तीय वर्ष 2025-26 में विभाग को 754 सड़कें व 200 पुल बनाने के लिए 9129 करोड़ रुपए की प्रशासकीय स्वीकृति मिली। पीडब्ल्यूडी अधोसंरचना विकास के काम तेजी से कर रहा है। कर्ज में स्थिरता के साथ कमाई बढ़ाने पर ध्यान
सरकार ने सब्सिडी विस्तार व पुरानी देनदारियों के बावजूद ऋण स्थिरता और व्यय गुणवत्ता के बीच संतुलन बनाए रखा है। दिसंबर 2023 में कुल 23,992 करोड़ की देनदारियां थीं। चुनौतियों के बावजूद राज्य की आर्थिक स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में संतुलित है। छग पर कर्ज और राज्य की जीएसडीपी का अनुपात 24% है। यह पंजाब (42.7%) और हिमाचल (35.7%) जैसे राज्यों से बहुत बेहतर है। सरकार ने उधारी के बजाय स्वयं की आय बढ़ाने पर ध्यान दिया, जिसमें जीएसटी, स्टाम्प पंजीकरण और खनिज रॉयल्टी में सुधार शामिल है। मध्य प्रदेश से पेंशन के 2,000 करोड़ प्राप्त हो चुके हैं। एक्सपर्ट व्यू – सुशील त्रिवेदी, रिटायर्ड आईएएस तकनीकी रूप से तैयार नहीं हैं विभाग बजट का 19 प्रतिशत ही खर्च कर पाना बताता है कि पीएचई तकनीकी रूप से बिल्कुल तैयार नहीं था। बिलासपुर हाईकोर्ट प्रदेश में सड़कों की खराब हालत को लेकर पहले कई बार शासन को नोटिस जारी कर चुका है। इसके बाद भी काम नहीं किए गए। सर्वे, तकनीकी कम्प्लायंस, टेंडरिंग, वर्क ऑर्डर से लेकर काम शुरू होने तक इतनी देर होती है कि बजट का उस वर्ष में उपयोग ही नहीं हो पाता है। खाद्य व नागरिक आपूर्ति निगम और महिला-बाल विभाग जैसे विभाग जहां बजट डेढ़ से दो गुना तक खर्च हो रहा है वह भी चिंता की बात है।
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