छत्तीसगढ़

घरेलू हिंसा या 498-ए का मामला दर्ज कराना मात्र पति के प्रति क्रूरता नहीं: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना या धारा 498-ए के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराना मात्र पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि पत्नी की ओर से शुरू किए गए आपराधिक मामले पूरी तरह झूठे, दुर्भावनापूर्ण या मनगढ़ंत थे, केवल कानूनी कार्रवाई को तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।

न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीक साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की युगल पीठ ने यह फैसला सुनाया। खंडपीठ ने महासमुंद फैमिली कोर्ट की तलाक की डिक्री रद करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली।

मामला महासमुंद निवासी जसमीत सिंह मक्कड़ और रज्जी कौर उर्फ रजनी के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों का विवाह 10 दिसंबर 2011 को सिख रीति-रिवाज से हुआ था और उनका आठ वर्षीय बेटा है।

पति ने फैमिली कोर्ट महासमुंद में सन 2021 में सिविल सूट दायर कर आरोप लगाया था कि पत्नी छोटी-छोटी बातों पर विवाद करती है, ससुराल वालों का सम्मान नहीं करती, बिना उचित कारण मायके चली जाती है और उस पर अलग रहने का दबाव बनाती है। पति ने 498-ए के मामले को भी मानसिक प्रताड़ना बताते हुए तलाक की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने सात नवंबर 2023 को पति के पक्ष में तलाक का आदेश पारित कर दिया, जिसके खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील की।

पत्नी की ओर से बताया गया कि वह स्वेच्छा से मायके में नहीं रही, बल्कि ससुराल में दहेज की मांग को लेकर उसके साथ मारपीट और मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना की गई। 2 जुलाई 2018 की घटना का उल्लेख करते हुए कहा गया कि मारपीट में उसका दांत टूट गया और उसे कमरे में बंद कर दिया गया था। इसके बाद वह किसी तरह गुरुद्वारे पहुंची और स्वजन व पुलिस को सूचना दी।

खंडपीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि सामान्य वैवाहिक मतभेद और नोक-झोंक को अपने आप क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसी तरह केवल कानूनी संरक्षण मांगना भी क्रूरता नहीं है, जब तक कार्यवाही के झूठी और दुर्भावनापूर्ण होने का प्रमाण न मिले।

कोर्ट ने परित्याग के आरोप पर भी कहा कि केवल अलग रहना पर्याप्त नहीं है। परित्याग साबित करने के लिए वैवाहिक संबंध को स्थायी रूप से समाप्त करने की मंशा यानी छोड़ने का पक्का इरादा भी साबित करना जरूरी है। रिकार्ड से सामने आया कि पत्नी ने कई अवसरों पर पति के साथ रहने की इच्छा जताई और समझौते के बाद वापस ससुराल भी गई थी।

कोर्ट ने पत्नी की चोट से संबंधित मेडिकल दस्तावेजों को भी महत्वपूर्ण माना। दांत टूटने की चोट के साक्ष्य से उसके अलग रहने के लिए उचित कारण होने की बात सामने आई। इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने माना कि पति क्रूरता और परित्याग के अपने आरोप पर्याप्त साक्ष्य से साबित नहीं कर सका।

खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट महासमुंद की 7 नवंबर 2023 की तलाक की डिक्री रद्द करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली।

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