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कोंडागांव के फरसगांव में बंगाली समुदाय चैत्र मास को भगवान शिव की कठोर तपस्या और आत्म-शुद्धि के पर्व के रूप में मना रहा है। फरसगांव ब्लॉक के बोरगांव और आसपास के क्षेत्रों में इन दिनों महादेव के जयकारों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई दे रही है। चैत्र संक्रांति के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले ‘चरक पूजा’ के अनुष्ठान ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय कर दिया है। परंपरा के अनुसार, युवा वर्ग इस पूरे माह सन्यास धारण कर कठिन नियमों का पालन कर रहा है। सन्यासियों की टोली भगवान शिव की प्रतिमूर्ति ‘डेल’ को लेकर गांव-गांव और घर-घर भ्रमण कर रही है। शिव-पार्वती का रूप धारण किए ये सन्यासी जब भक्तों के द्वार पर नाचते-गाते पहुंचते हैं, तो एक अनोखा श्रद्धापूर्ण दृश्य निर्मित होता है। लोग भी पूरी आस्था के साथ शिव स्वरूप का पूजन कर सन्यासियों को भिक्षा दान करते हैं। पूरे माह सन्यास धारण कर रहा युवा वर्ग इन सन्यासियों का जीवन इन दिनों किसी ऋषि-मुनि से कम नहीं है। टोली के सदस्यों ने बताया कि वे दिनभर ‘डेल’ लेकर भ्रमण करते हैं और रात्रि में किसी निर्दिष्ट स्थान पर पूजा-अर्चना के बाद केवल एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। आधुनिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर ये सन्यासी खुले आसमान के नीचे सोकर अपनी साधना पूरी कर रहे हैं। ‘खेजूर भांगा’ उत्सव का आयोजन 13 अप्रैल को आगामी 13 अप्रैल को पश्चिम बोरगांव तालाब किनारे ‘खेजूर भांगा’ उत्सव का आयोजन होगा। यह एक ऐसी परंपरा है जो आस्था की शक्ति को दर्शाती है। इसमें सन्यासी नंगे पांव ऊंचे खजूर के पेड़ों पर चढ़कर कांटों के बीच नृत्य करते हैं। मान्यता है कि शिव की भक्ति में लीन इन सन्यासियों को खजूर का एक भी कांटा नहीं चुभता। पेड़ के ऊपर से जब सन्यासी कच्चे खजूर नीचे फेंकते हैं, तो उसे पाने के लिए भक्तों में भारी उत्साह देखा जाता है। इस कठिन अनुष्ठान का समापन 14 अप्रैल को ‘चरक पूजा’ के साथ होगा। इस दौरान सन्यासी अपनी पीठ पर लोहे का कांटा लगाकर चरक की चकरी पर घूमते हैं, जो उनकी घोर तपस्या का प्रतीक है।
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