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झीरम घाटी हमला: NIA अदालत के 185 पन्नों के फैसले में साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर विस्तृत समीक्षा

झीरम घाटी हमले के मामले में NIA की विशेष अदालत का करीब 185 पन्नों का फैसला सिर्फ 25 मई 2013 को हुई वारदात तक सीमित नहीं है। अदालत ने यह भी देखा कि आरोपितों को प्रतिबंधित माओवादी संगठन और हमले से जोड़ने वाले साक्ष्य कितने विश्वसनीय हैं। घटनास्थल के फारेंसिक साक्ष्य, पोस्टमार्टम, बैलिस्टिक रिपोर्ट और गवाहियों को एक साथ रखकर अभियोजन की कहानी की जांच की गई। NIA के अनुसार हमले में 27 लोगों की मौत और 38 लोग घायल हुए थे।

फैसले में दर्ज फारेंसिक साक्ष्यों के अनुसार घटनास्थल करीब 10,61,874 वर्गफुट क्षेत्र में फैला था। सड़क के बीच करीब आठ से नौ फीट का गड्ढा बनाने के लिए विस्फोट किया गया था। मौके से 5.56 एमएम, 7.62 एमएम और एसएलआर समेत अलग-अलग हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े साक्ष्य मिले। बैलिस्टिक जांच के आधार पर करीब 206 गोलियां चलना प्रमाणित माना गया। मेडिकल और पोस्टमार्टम साक्ष्यों से 27 मौतों की प्रकृति हत्यात्मक होना स्थापित हुआ।

10 माओवादियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद फैसले में 27 मोस्ट वांटेड माओवादियों का भी उल्लेख है। इन्हें मामले में फरार बताया गया है। इनमें देवजी, देवा, सुरेंद्र, गणेश और अरुणाराव सहित अन्य नाम शामिल हैं। इनमें कुछ के आत्मसमर्पण करने अथवा मुठभेड़ में मारे जाने का भी उल्लेख है।

गवाहों के अनुसार हमले से पहले 11 दिन तक प्रशिक्षण और गांवों में बैठकें हुई थीं। एक गवाह नंदकुमार पटेल के ड्राइवर ने वाहन में तत्कालीन कांग्रेस नेता कवासी लखमा के होने और रास्ते में गोंडी में बातचीत का उल्लेख किया है। फैसले में कई गवाहियों में हमले से पहले माओवादी गतिविधियों, बैठकों और प्रशिक्षण का जिक्र है। एक अभियोजन गवाह ने 2009 में माओवादियों के साथ काम करने और सात-आठ दिन प्रशिक्षण लेने की बात कही। दूसरी गवाही में 2013 में गांव में माओवादी सदस्यों की बैठक का उल्लेख है।

इस बैठक में देवा, विनोद, महादेव, मुन्ना, जोगा और कोसा समेत कई नाम सामने आए। गवाही के अनुसार पुलिस पर हमले तथा हथियार और अन्य सामान जुटाने पर चर्चा हुई थी। कुछ गवाहियों में माओवादियों के गांव पहुंचने, ग्रामीणों को बुलाने और भोजन उपलब्ध कराने का भी उल्लेख है।

बचाव पक्ष ने आरोपितों की पहचान को लेकर आपत्ति दर्ज की। दलील दी गई कि जांच के दौरान टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई। अदालत में पहली बार हुई पहचान को भी चुनौती दी गई। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा गया कि अदालत में आरोपित की पहचान मूल साक्ष्य हो सकती है। TIP जांच का हिस्सा है और अदालत में पहचान की पुष्टि के लिए कराई जाती है। इसलिए केवल TIP नहीं होने से अदालत में की गई पहचान स्वतः अस्वीकार्य नहीं होती। उसकी विश्वसनीयता अन्य प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के साथ परखी जानी चाहिए।

बचाव पक्ष ने कुछ गवाहों के धारा 161 के तहत बयान देर से दर्ज होने को भी आधार बनाया। अदालत ने माना कि बयान में देरी मात्र से गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती। इसके लिए देरी का कारण, मामले की परिस्थितियां और दूसरे साक्ष्यों से गवाही की संगति देखना जरूरी है।

फैसले में अभियोजन साक्षी क्रमांक 23 की गवाही का भी उल्लेख है। गवाह के अनुसार परिवर्तन यात्रा के दौरान कवासी लखमा नंदकुमार पटेल के वाहन में बैठे थे। रास्ते में उन्हें कई फोन आए और गवाह ने उनके गोंडी में बातचीत करने की बात कही। गवाही में करीब 10-15 काल का उल्लेख है। नंदकुमार पटेल द्वारा हिंदी में बात करने को कहे जाने की बात भी दर्ज है। यह अभियोजन साक्षी का कथन है, अदालत का निष्कर्ष नहीं। इसलिए आगे की न्यायिक प्रक्रिया में यह सवाल उठ सकता है कि रिकार्ड में आए इस हिस्से का किसी निष्कर्ष के लिए उपयोग क्यों नहीं किया गया।

NIA के रिकार्ड के अनुसार पहले नौ गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ 2014 में आरोपपत्र दाखिल हुआ था। इसके बाद 2015 में 30 आरोपियों के खिलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किया गया। फरार आरोपियों के संबंध में जांच जारी रखी गई थी। NIA की 16 सितंबर 2026 की जानकारी के मुताबिक विशेष अदालत ने झीरम घाटी हमले में 10 आरोपी माओवादी कैडरों को मृत्युदंड सुनाया है। अब उन आरोपपत्रित आरोपियों की स्थिति भी महत्वपूर्ण है, जो लंबे समय तक वांछित रहे और बाद में आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इनके खिलाफ झीरम मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई किस तरह होगी, यह महत्वपूर्ण सवाल है।

विशेष अदालत के फैसले के बाद मामला हाईकोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया में जाएगा। मृत्युदंड के मामलों में हाईकोर्ट की पुष्टि की प्रक्रिया भी कानून का हिस्सा है। बचाव पक्ष पहचान, गवाहियों में देरी और साक्ष्यों की स्वीकार्यता जैसे मुद्दे उठा सकता है। अभियोजन वैज्ञानिक साक्ष्य, घटनास्थल, मेडिकल रिपोर्ट और गवाहियों के समग्र प्रभाव पर जोर देगा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की स्थिति में इन सभी पहलुओं की दोबारा न्यायिक समीक्षा संभव होगी।

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