छत्तीसगढ़

27 साल बाद भी अधूरा है भिलाई-3 का मिनी स्टेडियम, पांच परिषदों का कार्यकाल बीता, एक ईंट नहीं रखी गई

नगर निगम भिलाई-चरोदा का एक और पंचवर्षीय कार्यकाल इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने जा रहा है। मौजूदा महापौर निर्मल कोसरे एवं निर्वाचित पार्षदों का कार्यकाल पूरा होने की कगार पर है, लेकिन भिलाई-3 का बहुप्रतीक्षित मिनी स्टेडियम इस बार भी अपनी पूर्णता की राह ताकता ही रह गया।

लगभग 27 वर्षों के लंबे अंतराल में पांच निर्वाचित परिषदों के बदलाव और दो बार व्यापक बेदखली अभियान चलाए जाने के बावजूद स्टेडियम का निर्माण पूरा न होना स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दरअसल, इस मिनी स्टेडियम की कहानी वर्ष 1998 से शुरू होती है, जब तत्कालीन विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण साडा भिलाई-दुर्ग द्वारा इसकी आधारशिला रखी गई थी। उस समय अविभाजित पाटन के तत्कालीन विधायक भूपेश बघेल के विशेष प्रयासों से स्टेडियम निर्माण की योजना को गति मिली थी। निर्माण में बाधा बन रही कुंदरा पारा बस्ती को हटाकर वहां के निवासियों को विश्व बैंक कॉलोनी के समीप गुरु घासीदास नगर में व्यवस्थित रूप से बसाया गया था। हालांकि यह उत्साह अधिक समय तक नहीं टिक सका।

वर्ष 1999 में साडा को भंग कर भिलाई-चरोदा को स्वतंत्र नगर पालिका का दर्जा दे दिया गया। निकाय के पुनर्गठन के साथ ही स्टेडियम का निर्माण कार्य ठप पड़ गया। समय बीतने के साथ खाली कराई गई जमीन पर एक बार फिर अतिक्रमण बढ़ा और कुंदरा पारा बस्ती पुन: आबाद हो गई।

निगम प्रशासन ने स्टेडियम निर्माण के नाम पर जीई रोड और राम मंदिर वाले छोर पर कुछ व्यावसायिक दुकानों का निर्माण जरूर कराया और उनकी नीलामी भी कर दी। वर्तमान में इन अधिकांश दुकानों में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, लेकिन मुख्य मिनी स्टेडियम का निर्माण कार्य जस का तस अटका रहा।

इस बीच जब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने, तो स्थानीय खेल प्रेमियों और नागरिकों में एक नई उम्मीद जागी। नगर निगम भिलाई-चरोदा में भी कांग्रेस की सरकार होने से स्टेडियम का निर्माण पूरा होने का विश्वास गहरा गया था। इसी उम्मीद के तहत लगभग चार वर्ष पूर्व एक बार फिर कड़ा कदम उठाते हुए स्टेडियम की भूमि पर काबिज कुंदरा पारा बस्ती को बेदखल किया गया और प्रभावित परिवारों को उमदा स्थित प्रधानमंत्री आवास योजना में शिफ्ट किया गया।

जमीन पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त कराए जाने के चार साल बीत जाने के बाद भी मैदान पर एक ईंट तक नहीं रखी जा सकी है। निकाय का कार्यकाल खत्म होने को है, लेकिन स्टेडियम का काम आज भी अधर में लटका है। स्थानीय खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों का कहना है कि इतने वर्षों में कई चुनाव आए और चले गए, लेकिन खेल सुविधाओं का सपना अधूरा ही रहा।

एक स्वतंत्र निकाय बनने के बाद पांच निर्वाचित परिषदों का कार्यकाल पूरा हो जाना और इसके बावजूद एक मिनी स्टेडियम न बन पाना प्रशासनिक उदासीनता का हास्यास्पद उदाहरण बन चुका है।

क्षेत्रवासियों को बहुत जल्द सर्वसुविधायुक्त स्टेडियम की सौगात मिलने की उम्मीद है। इसके लिए आवश्यक पहल शुरू कर दी गई है और निर्माण संबंधी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। स्टेडियम बनने से क्षेत्र के खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी तथा खेल गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

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