Facebook Twitter Youtube
  • Home
  • देश
  • विदेश
  • राज्य
  • अपराध
  • खेल
  • मनोरंजन
  • शिक्षा
  • न्याय
  • राजनीति
  • साहित्य
  • धर्म-समाज
  • वीडियो
  • Home
  • देश
  • विदेश
  • राज्य
  • अपराध
  • खेल
  • मनोरंजन
  • शिक्षा
  • न्याय
  • राजनीति
  • साहित्य
  • धर्म-समाज
  • वीडियो
Home » Goat skin and the shaved head of a Shivana girl | बकरे की चमड़ी-शिवना लकड़ी से बना मुंडा बाजा: मां-दंतेश्वरी की आराधना के लिए बजाते है; इसके बिना नहीं होती कोई रस्म; 617 साल पुरानी परंपरा – Jagdalpur News
Breaking News

Goat skin and the shaved head of a Shivana girl | बकरे की चमड़ी-शिवना लकड़ी से बना मुंडा बाजा: मां-दंतेश्वरी की आराधना के लिए बजाते है; इसके बिना नहीं होती कोई रस्म; 617 साल पुरानी परंपरा – Jagdalpur News

By adminOctober 3, 2025No Comments4 Mins Read
Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email
comp 124 1 1759459334
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email


बस्तर में अलग-अलग परंपरा और रीति-रिवाजों में अलग-अलग तरह के वाद्ययंत्रों का विशेष महत्व है। आदिवासी कल्चर में शादी से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक नृत्य तक कई तरह के बाजा बजाने का विधान है। इनमें सबसे खास मुंडा बाजा है।

.

जिसे बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की आराधना करने, बस्तर दशहरा में उनकी डोली और छत्र के सामने बजाने का विधान करीब 617 सालों से चला आ रहा है। कहा जाता है कि जब तक यह बाजा नहीं बजता है तब तक देवी की आराधना अधूरी मानी जाती है।

इस बाजे के बिना मां की आराधना अधूरी मानी जाती है।

इस बाजे के बिना मां की आराधना अधूरी मानी जाती है।

मां दंतेश्वरी की आराधना के लिए बजाते है मुंडा बाजा।

मां दंतेश्वरी की आराधना के लिए बजाते है मुंडा बाजा।

ढाई फीट के मुंडा बाजा का इतिहास

बस्तर के पोटानारा गांव के रहने वाले मुंडा जनजाति के लोग ही इस बाजा को बनाते हैं, बजाते हैं। बकरे के चमड़े और शिवना लकड़ी से बने करीब ढाई फीट के इस मुंडा बाजा के इतिहास को आज हम आपको बताएंगे। कैसे सिर्फ मुंडा जनजाति के लोग ही इसे बनाते हैं? कैसे ये परंपरा में आया?

अच्छी आवाज निकालने के लिए ये बाजा बनाया

दरसअल, बस्तर जिले के पोटानारा गांव में मुंडा जनजाति के लोग रहते हैं। इस समुदाय के अध्यक्ष परमेश्वर बघेल का कहना है कि, हमारे पूर्वज पहले मिट्टी का घड़ा या बड़े आकार का दीपक और उसपर मेंढक की चमड़ी से छोटा-छोटा बाजा बनाते थे। इससे निकलने वाली धुन मधुर होती थी।

वहीं और अच्छी आवाज निकालने के लिए फिर धीरे-धीरे बकरे की चमड़ी से बाजा बनाने लगे। उन्होंने कहा कि, हमें हमारे पूर्वजों ने बताया था कि सालों पहले बस्तर में परिक्रमा के दौरान रथ कहीं फंस गया था। तत्कालीन राजा ने हाथी-घोड़े से रथ खिंचवाया, जिसके बाद भी रथ नहीं निकला था।

मुंडा जनजाति के लोग ही ये बाजा बनाते हैं और बजाते है।

मुंडा जनजाति के लोग ही ये बाजा बनाते हैं और बजाते है।

मुंडा जनजाति के लोग बनाते है बाजा

उस समय बस्तर के तत्कालीन राजा ने हमारे पूर्वजों को बुलाया। पूर्वजों ने देवी की आराधना की, भजन-कीर्तन किया, बाजा बजाया। देवी की आराधना के बाद कुछ ही देर में जब रथ को दोबारा खींचा गया तो रथ निकल गया। जिसके बाद राजा भी खुश हुए थे।

तब से राजा ने निर्णय लिया था कि मां दंतेश्वरी की पूजा, डोली या फिर छत्र समेत रथ की परिक्रमा हो तो इस बाजा को ही बजाया जाएगा। तब से मुंडा जनजाति के लोग ही ये बाजा बनाते हैं, खुद बजाते हैं। उन्होंने कहा कि हम लोग देवी दंतेश्वरी के साथ ही ऋषि मावली माता की भी पूजा करते हैं।

समुदाय के अध्यक्ष परमेश्वर बघेल।

समुदाय के अध्यक्ष परमेश्वर बघेल।

whatsapp image 2025 10 01 at 50927 pm1759401810 1759459549

अब जानिए कैसे बनता है बाजा

मुंडा जनजाति के सदस्य मनोज बघेल और बद्रीनाथ नाग ने बताया कि बस्तर दशहरा में निशा जात्रा की रस्म अदा की जाती है। इस रस्म में 12 बकरों की बलि दी जाती है। जिसके बाद इन बकरों के चमड़े से मुंडा जनजाति के लोग बाजा बनाते हैं। ये परंपरा भी पूर्वजों के समय से चल रही है। करीब 20 से 30 लोगों का समूह एक साथ बाजा बजाते हैं।

2 से ढाई फीट का होता है बाजा

मुंडा बाजा करीब 2 से ढाई फीट का होता है। इसका एक हिस्सा गोल और थोड़ा मोटा होता है, जबकि दूसरा हिस्सा पतला होता है। इस बाजा के ढांचे में अलग-अलग तरह की कलाकृतियां उकेरी जाती है। जिसमें देवी-देवताओं की कलाकृति के साथ ही बस्तर दशहरा, रथ परिक्रमा की भी कलाकृति होती है।

अलग-अलग तरह की कलाकृतियां उकेरी जाती हैं।

अलग-अलग तरह की कलाकृतियां उकेरी जाती हैं।

एक बाजा बनाने में 10 हजार तक का खर्च

बाजा में एक रस्सी बांधी जाती है। जिसे बजाने वाला व्यक्ति रस्सी को बाएं कंधे के ऊपर और बाजा को बाएं हाथ के नीचे रखकर बजाता है। साथ ही देवी की आराधना करने भजन-कीर्तन करता है। वर्तमान में एक बाजा को बनाने में करीब 10 हजार रुपए से ज्यादा का खर्च आता है। इस जनजाति के लोगों का कहना है कि शिवना लड़की भी मुश्किल से मिलती है।



<



Advertisement Carousel

theblazeenews.com (R.O. No. 13229/12)

×
Popup Image



Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email
admin
  • Website

Related Posts

गर्मी की छुट्टियों में रेल यात्रियों के लिए खुशखबरी, एलटीटी से सांतरागाछी के बीच बिलासपुर-दुर्ग-रायपुर होकर चलेगी स्पेशल ट्रेन

April 18, 2026

भीषण गर्मी में राहत… बिलासपुर में दोपहर 12 से 4 बजे तक बंद रहेंगे ट्रैफिक सिग्नल, SSP ने जारी किए निर्देश

April 18, 2026

छत्तीसगढ़ में जानलेवा गर्मी का कहर, रायपुर-बिलासपुर में तापमान 43 डिग्री पार; लू और बिजली कटौती से हालात बेकाबू

April 18, 2026

Comments are closed.

samvad add RO. Nu. 13766/133
samvad add RO. Nu. 13766/133
Stay In Touch
  • Facebook
  • Twitter
  • YouTube
  • Telegram
Live Cricket Match

[covid-data]

Our Visitor

067675
Views Today : 11
Views Last 7 days : 916
Views Last 30 days : 3952
Total views : 88603
Powered By WPS Visitor Counter
About Us
About Us

Your source for the Daily News in Hindi. News about current affairs, News about current affairs, Trending topics, sports, Entertainments, Lifestyle, India and Indian States.

Our Picks
Language
Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest
  • Home
© 2026 ThemeSphere. Designed by ThemeSphere.

Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.