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Home » सैटेलाइट और ड्रोन सर्विलांस से ढहा माओवादियों का किला, ढाई साल में 500 नक्सली ढेर, 2900 ने किया सरेंडर
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सैटेलाइट और ड्रोन सर्विलांस से ढहा माओवादियों का किला, ढाई साल में 500 नक्सली ढेर, 2900 ने किया सरेंडर

By adminApril 3, 2026No Comments3 Mins Read
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02 04 2026 cg naxalite surrender
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सतीश पांडेय, नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादी विरोधी अभियान अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। सुरक्षा बलों ने पारंपरिक रणनीतियों से आगे बढ़ते हुए अत्याधुनिक तकनीक को हथियार बनाया है, जिसका असर अब जमीन पर साफ नजर आने लगा है।

ड्रोन, सैटेलाइट सर्विलांस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल लोकेशन ट्रैकिंग जैसे उपकरणों के इस्तेमाल से माओवादियों के ठिकाने और गतिविधियां तेजी से उजागर हो रही हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा का दावा है कि इसी रणनीति के चलते पिछले ढाई वर्षों में 500 से अधिक माओवादी मारे गए हैं और आने वाले समय में यह अभियान और तेज किया जाएगा।

तकनीक बनी सबसे बड़ा हथियार

माओवादी विरोधी मुहिम में तकनीक ने गेम चेंजर की भूमिका निभाई है। सुरक्षा बलों को ड्रोन ऑपरेशन, सैटेलाइट इमेजिंग और एआई आधारित निगरानी प्रणाली का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। पांच से 25 किलोमीटर की रेंज वाले आधुनिक ड्रोन और एआई के जरिए अब जंगलों के भीतर भी 24 घंटे निगरानी संभव हो गई है। इससे माओवादियों के कोर जोन अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में छिपे ठिकानों की पहचान कर सटीक कार्रवाई की जा रही है।

आंकड़ों में सफलता की कहानी

पिछले ढाई वर्षों में सुरक्षा बलों ने 536 माओवादियों को मार गिराया है। इसके अलावा 2,900 से अधिक माओवादी आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे हैं, जबकि 2,038 माओवादियों को गिरफ्तार किया गया है। इस दौरान 1,258 आधुनिक हथियार भी बरामद किए गए हैं, जिनमें एके-47, एसएलआर, इंसास और एलएमजी जैसी घातक राइफलें शामिल हैं। यह आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि अभियान अब निर्णायक दिशा में बढ़ रहा है।

खुफिया नेटवर्क हुआ ध्वस्त

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, माओवादियों के जमावड़े और मूवमेंट की रीयल-टाइम जानकारी मिलने से उनके खुफिया नेटवर्क को गहरा झटका लगा है। सैटेलाइट और ड्रोन से मिली स्पष्ट तस्वीरों ने उनके सुरक्षित ठिकानों को उजागर कर दिया है। इससे न केवल उनके हमलों की क्षमता घटी है, बल्कि उनकी रणनीतिक बढ़त भी खत्म होती जा रही है।

बदलती सरकारों के साथ बदली रणनीति

साल 2000 में राज्य गठन के बाद से माओवाद के खिलाफ रणनीतियां लगातार बदलती रही हैं। जोगी सरकार ने पुलिस आधुनिकीकरण पर जोर दिया, जबकि डॉ. रमन सिंह सरकार ने सलवा जुडूम और सख्त सैन्य कार्रवाई अपनाई। भूपेश बघेल सरकार ने विकास, विश्वास और सुरक्षा के मॉडल पर काम किया। अब विष्णु देव साय सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में समयसीमा तय कर निर्णायक कार्रवाई शुरू की है।

‘ट्रिपल ए’ रणनीति से बैकफुट पर नक्सली

सुरक्षा बलों ने “ट्रिपल ए” रणनीति एग्रेसिव एक्शन, एरिया डॉमिनेशन और एडमिनिस्ट्रेटिव रीच के जरिए माओवादियों पर दबाव बढ़ाया है। डीआरजी, कोबरा और बस्तर फाइटर जैसी यूनिट्स ने स्थानीय जानकारी और तकनीक के संयोजन से माओवादियों के रसद और वित्तीय नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया है। ऑपरेशन कगार और ब्लैक फॉरेस्ट जैसे अभियानों ने लगातार सफलता दिलाई है।

सुरक्षा ढांचे का तेजी से विस्तार

अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में 600 से अधिक नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। साथ ही 68 नाइट-लैंडिंग हेलिपैड बनाए गए हैं, जिससे जवानों की लॉजिस्टिक क्षमता कई गुना बढ़ी है। इससे पहले जो इलाके माओवादियों के सेफ जोन माने जाते थे, वहां अब सुरक्षा बलों की मजबूत मौजूदगी है।

पुनर्वास नीति से बढ़ा आत्मसमर्पण

नई पुनर्वास नीति 2025 के तहत माओवादियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। बेहतर सुविधाएं और सुरक्षा मिलने के कारण आत्मसमर्पण की संख्या में तेजी आई है। साथ ही स्थानीय युवाओं की बस्तर फाइटर में भर्ती से खुफिया तंत्र मजबूत हुआ है, जिससे गोरिल्ला युद्ध में भी सुरक्षा बलों को बढ़त मिली है।



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