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Home » संघर्ष से सफलता की मिसाल… 7 साल की उम्र में माता-पिता को खोया, रिसॉर्ट में सफाई का काम किया और अब ‘खेलो इंडिया’ में जीता रजत पदक
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संघर्ष से सफलता की मिसाल… 7 साल की उम्र में माता-पिता को खोया, रिसॉर्ट में सफाई का काम किया और अब ‘खेलो इंडिया’ में जीता रजत पदक

By adminApril 2, 2026No Comments2 Mins Read
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02 04 2026 from struggle to success
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सम की महिला पहलवान देबी डायमारी ने अपने संघर्ष और मेहनत के दम पर खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में रजत पदक जीतकर एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। …और पढ़ें

Publish Date: Thu, 02 Apr 2026 07:21:12 PM (IST)Updated Date: Thu, 02 Apr 2026 07:22:07 PM (IST)

संघर्ष से सफलता की मिसाल... 7 साल की उम्र में माता-पिता को खोया, रिसॉर्ट में सफाई का काम किया और अब 'खेलो इंडिया' में जीता रजत पदक
संघर्ष से सफलता की मिसाल

HighLights

  1. देबी डायमारी ने जीता रजत पदक
  2. नौकरी के साथ जारी रखी ट्रेनिंग
  3. अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लक्ष्य

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। असम की महिला पहलवान देबी डायमारी ने अपने संघर्ष और मेहनत के दम पर खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में रजत पदक जीतकर एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। आर्थिक तंगी, पारिवारिक कठिनाइयों और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।

बचपन से संघर्ष भरी जिंदगी

गोलाघाट जिले के सिसुपानी स्थित दिनेशपुर गांव की रहने वाली 28 वर्षीय देबी ने सात साल की उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था। इसके बाद उनका पालन-पोषण चाचा-चाची ने किया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें अपने खेल के सपनों को जिंदा रखने के लिए छोटे-मोटे काम करने पड़े।

नौकरी के साथ जारी रखी ट्रेनिंग

देबी ने वर्ष 2022 में बोकाखात स्थित खेलो इंडिया केंद्र में कुश्ती की शुरुआत की। रहने और ट्रेनिंग का खर्च उठाने के लिए उन्होंने ईजी बाजार स्टोर में 2500 रुपये मासिक वेतन पर काम किया और बाद में काजीरंगा के एक रिसॉर्ट में करीब 7000 रुपये की नौकरी की। वह स्विमिंग पूल की देखभाल और सफाई का काम करती थीं और दिनभर काम के बाद शाम को दो घंटे अभ्यास करती थीं।

कोच के मार्गदर्शन से मिली दिशा

शुरुआत में देबी पावरलिफ्टिंग और आर्म रेसलिंग से जुड़ी थीं, लेकिन वर्ष 2022 में कोच अनुस्तूप नाराह से मुलाकात के बाद उन्होंने कुश्ती को अपनाया। कोच ने प्रशिक्षण के साथ रहने और काम की व्यवस्था में भी मदद की, जिससे वह खेल पर ध्यान केंद्रित कर सकीं।



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