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अहिंसा रक्षा पदयात्रा के अंतर्गत महासमाधि धारक आचार्य विद्यासागर महाराज से दीक्षित मुनि धर्म सागर महाराज और मुनि भाव सागर महाराज के सान्निध्य में चल रही पदयात्रा का शनिवार को श्री दिगंबर जैन मंदिर कुनकुरी में प्रवेश हुआ। मुनि संघ ने लगभग 700 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी कर कुनकुरी में प्रवेश किया, जिससे जैन समाज में उत्साह का माहौल बन गया।मुनि संघ के मंगल प्रवेश पर कुनकुरी जैन समाज के लोगों ने जगह-जगह पाद प्रक्षालन किया और आरती उतारकर उनका भावभीना स्वागत किया। मुनि संघ के पद विहार में भारत के कई नगरों से आए श्रद्धालु और महानुभाव शामिल हुए।
मुनिने जीवन में कामयाबी हासिल करने का मूल मंत्र बताते हुए कहा कि “जीत उन्हीं की होती है जो अपने काम को पूरा करने में अपने तन-मन को लगा देते हैं और आखिरी क्षणों तक हार नहीं मानते। उन्होंने जोर दिया कि हारने पर बहानेबाजी में ऊर्जा बरबाद नहीं करनी चाहिए, बल्कि नये तरीके खोजने चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि हार का मतलब, सब कुछ समाप्त नहीं बल्कि सब कुछ फिर से शुरू करना है।भरी हुई आंखो से साफ दिखाई नहीं देता, हार के बारे में सोचेंगे तो जीत साफ दिखाई नहीं देगी। उन्होंने बताया कि सफलता संयोग से नहीं, समर्पण से मिलती है, और हार तो हमें केवल ये सिखाती है कि अगली बार क्या न किया जाए। मुनि भावसागर ने आत्म-मूल्यांकन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सफलता तभी तय है जब हम अपनी प्रगति का विश्लेषण स्वयं करें और अपनी लड़ाई खुद लड़ें। इस अवसर पर जैन मंदिर प्रांगण में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि भावसागर जी महाराज ने सफलता, असफलता और कर्म में तन्मयता पर प्रेरणादायक उद्बोधन दिया।
उन्होंने कहा कि अक्सर लोग प्रयासों के बाद इच्छित फल न मिलने पर हार मान लेते हैं, निराश हो जाते हैं और दूसरों को दोष देने लगते हैं।हार-जीत का खेल, दिलो-दिमाग और तन्मयता का खेल है। जीत और हार में ज्यादा अन्तर नहीं होता, सिर्फ एक कदम का अन्तर होता है। एक कदम आगे चलने वाला जीत जाता है। इसका मतलब ये नहीं कि एक कदम पीछे रहने वाला हार गया है, बल्कि इसका मतलब केवल इतना है कि अभी एक कदम और चलने को रह गया है।
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