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प्रदेश में अपनी विशिष्ट आस्था और परंपरा के लिए विख्यात सिद्धपीठ श्री खेड़ापति हनुमान मंदिर में अगहन शुक्ल त्रयोदशी पर आज बुधवार को ग्रंथी पूजन का आयोजन किया गया है। जो कि विगत 27 वर्षों से आयोजित किया जा रहा है। यह अनुष्ठान पूरे प्रदेश में केवल सिद्धपीठ खेड़ापति हनुमान मंदिर में आयोजित किया जाता रहा है। पुजारी चंद्रकिरण तिवारी ने बताया कि यह पूजा अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट मानी जाती है। इस विशेष अनुष्ठान में हजारों भक्त अपने-अपने संकट निवारण की कामना से पीले धागे की ग्रंथी पूजा कराते हैं। जिसे स्वयं और परिवारजन धारण करते हैं।
बताया कि ग्रंथी पूजन का विधान भविष्य पुराण में वर्णित है, जिसे महर्षि व्यास द्वारा रचित अत्यंत गुप्त एवं दुर्लभ अनुष्ठान माना गया है। इसके अंतर्गत अगहन शुक्ल त्रयोदशी के दिन प्रातःकाल नदी या सरोवर में स्नान कर, वहां विधिवत पूजा करने के पश्चात जल लाने का विधान है। जिसके बाद भक्त घर या मंदिर परिसर में गौरी-गणेश एवं कलश स्थापना कर विधि-विधान से हनुमान जी का पूजन करते हैं। पीले धागे में ओम भगवते वायुनन्दनाय नमः मंत्र का जाप करते हुए, तेरह गांठें लगाई जाती हैं। पूजन के पश्चात इस ग्रंथी को हनुमान जी के चरणों में अर्पित कर भक्त इसे धारण करते हैं।
ग्रंथी पूजन को लेकर के पुरातन मान्यता जुड़ी है पुजारी ने बताया कि मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाले सभी प्रकार के संकट और बाधाएं समाप्त होती हैं। मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। व्रत कलियुग में विशेष फलदायी माना गया है। बताया कि श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व ऋष्यमूक पर्वत पर सम्पूर्ण वानर सेना के साथ यह व्रत किया था। जिसके फलस्वरूप लंका विजय संभव हुई। इसी प्रकार पाण्डवों ने भी वनवास काल में यह व्रत किया था।
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